Philosophical QuotesRajneesh Osho

अर्धनारीश्वर का रहस्य

ardhnarishwar rahasya

आपका वीर्य-कण दो तरह की आकांक्षाएं रखता है।
एक आकांक्षा तो रखता है बाहर की स्त्री से मिलकर, फिर एक नए जीवन की पूर्णता पैदा करने की।

एक और गहन आकांक्षा है, जिसको हम अध्यात्म कहते हैं, वह आकांक्षा है, स्वयं के भीतर की छिपी स्त्री या स्वयं के भीतर छिपे पुरुष से मिलने की। अगर बाहर की स्त्री से मिलना होता है, तो संभोग घटित होता है। वह भी सुखद है, क्षण भर के लिए। अगर भीतर की स्त्री से मिलना होता है, तो समाधि घटित होती है। वह महासुख है, और सदा के लिए। क्योंकि बाहर की स्त्री से कितनी देर मिलिएगा ? देह ही मिल पाती है, मन नहीं मिल पाते; मन भी मिल जाए, तो आत्मा नहीं मिल पाती। और सब भी मिल जाए तो मिलन क्षण भर ही हो सकता है। भीतर की स्त्री से मिलना शाश्वत हो सकता है।

बाहर की स्त्री से मिलना है, तो वीर्य-कण की जो देह है, उसके सहारे ही मिलना पड़ेगा, क्योंकि देह का मिलन तो देह के सहारे ही हो सकता है। अगर भीतर की स्त्री से मिलना है तो देह की कोई जरूरत नहीं है। वीर्य-कण की देह तो अपने केंद्र में, काम-केंद्र में पड़ी रह जाती है; और वीर्य-कण की ऊर्जा उससे मुक्त हो जाती है। वही ऊर्जा भीतर की स्त्री से मिल जाती है। इस मिलन की जो आत्यंतिक घटना है, वह सहस्रार में घटित होती है। क्योंकि सहस्रार ऊर्जा का श्रेष्ठतम केंद्र है, और काम-केंद्र देह का श्रेष्ठतम केंद्र है।

ऊर्जा शुद्ध हो जाती है सहस्रार में पहुंच कर; सिर्फ ऊर्जा रह जाती है, प्योर इनर्जी। और सहस्रार में आपकी स्त्री प्रतीक्षा कर रही है। और आप अगर स्त्री हैं, तो सहस्रार में आपका पुरुष आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यह भीतरी मिलन है।

इस मिलन को ही अर्धनारीश्वर कहा है !!!

 

!!समाधि के सप्त-द्वार!!

Rajneesh Osho

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