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रास रंग की होली भंग व तरंग की होली

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फाल्गुन का महीना। रास रंग की होली भंग व तरंग की होली। हर युग की होली। हर देवताओं की होली। हर पुराणों की होली। कुछ तो बात है होली में, जो वह सब पर्वों से ऊपर है। जिसे महादेव ने भी खेला, कृष्ण ने भी खेला, विष्णु ने भी खेला, राम ने भी खेला, सूफियों ने भी खेला। भक्त प्रह्लाद से जुड़ना ही होली नहीं है। फिर महादेव क्यों खेले ? माधव व राघव क्यों खेले ? युगों का अंतर है। “होली ” का दूसरा नाम आनंद है। आनंद ही परमानंद है। आनंद ही घनश्याम है। आनंद ही राम हैं। आनंद ही शिव हैं। आनंद ही जीवन है। आनंद ईश्वर को प्रिय है। आनंद को ही पर्व कहा गया है। आनंद को ही रस कहा गया है। आनंद को ही रास कहा गया है। आनंद का संबंध हृदय से है। आनंद का संबंध सृष्टि और समष्टि से है। गुलाल और अबीर लगाकर जब हम मस्त हो जाएँ तो वह होली है।

 

Happy Holi

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