हर घर अपना घर, पर बंजारा मन। गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

/
16 Views

osho-poem-ye-awara-man

हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

एक से हजार हुआ, यह सारा मन।
गिर कर न सिमटे फिर, यह पारा मन।
खुद को ही जीत-जीत, है हारा मन।
कितना बेबाक, कितना बेचारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

शूल-सा चुभे, यह फूल-सा प्यारा मन।
अंधा, पर सबकी आंखों का तारा मन।
खुद के न पांव, पर सबका सहारा मन।
हर गले का हार, यह गले की कारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

हर कहीं दिल दे बैठे, यह क्वांरा मन।
कोठे का किवारा, मंदिर का भी द्वारा मन।
हर बर्तन की हो ले, ऐसी जलधारा मन।
कितना भोला है और कितना हुशियारा मन!
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

नये-नये रूप धरे, फिर वही दुबारा मन।
बेनकाब कैसे हो, यह सजा-संवारा मन।
छुप-छुप कर बदले ले, यह इनकारा मन।
जाने कब डस ले, यह फन मारा मन।
श्वान-सा हो संग, फिर-फिर दुतकारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

पीकर न प्यास बुझे, सागर-सा खारा मन।
कस्तूरी मृग-सा फिरे, वन-वन यह मारा मन।
होश से मिले तो हरदम करे किनारा मन।
देखते ही छार हो, यह अनंग-अंगारा मन।
शव से शिव-रूप हुआ, यह मन से मारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

एक अबूझ पहेली, एक जादुई पिटारा मन।
अभी लहर, अभी भंवर, अभी किनारा मन।
हमसे ही दगा करे, बेवफा हमारा मन।
दुश्मन से भी जालिम, दोस्त से भी प्यारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

आपुई गई हिराय (प्रश्नत्तोर) – ओशो

This div height required for enabling the sticky sidebar