आस्तिक और नास्तिक में श्रेष्ठ कौन है?

astik aur nastik me shreshth kaun hai

प्रश्न:- आस्तिक और नास्तिक में श्रेष्ठ कौन है..?

उत्तर:- मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूँ, वे ही असली पात्र हैं। आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं। आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं। अब आस्तिको में सच्चा आदमी कहाँ मिलता है?

अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे। अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है।

आस्तिक के आस्तिक होने में ही झूठ है। उसे पता तो है नहीं ईश्वर का कुछ, और मान बैठा है। न आत्मा का कुछ पता है, और विश्वास कर लिया है। यह तो झूठ की यात्रा शुरू हो गयी। और बड़े झूठ! एक आदमी छोटे-मोटे झूठ बोलता है, उसको तुम क्षमा कर देते हो। क्षमा करना चाहिए। लेकिन ये बड़े-बड़े झूठ क्षम्य भी नहीं हैं। ईश्वर का पता है? अनुभव हुआ है? दीदार हुआ है? दर्शन हुआ है? साक्षात्कार हुआ है? कुछ नहीं हुआ। माँ-बाप से सुना है। पंडित-पुरोहित से सुना है।

आसपास की हवा में गूँज है कि ईश्वर है, मान लिया है। भय के कारण, लोभ के कारण, संस्कार के कारण। यह मान्यता दो कौड़ी की है। यह असली आस्तिकता थोड़े ही है। यह नकली आस्तिकता है। असली आस्तिकता असली नास्तिकता से शुरू होती है।

नास्तिक कौन है? नास्तिक वह है जो कहता है, मुझे अभी पता नहीं, तो कैसे मानूँ? जब तक पता नहीं, तब तक कैसे मानूँ? जानूँगा तो मानूँगा। और जब तक नहीं जानूँगा, नहीं मानूँगा।

मैं ऐसे ही नास्तिकों की तलाश में हूँ। जो कहता है जब तक नहीं जानूँगा तब तक नहीं मानूँगा, मैं उसी के लिए हूँ। क्योंकि मैं जनाने को तैयार हूँ। आओ, मैं तुम्हें ले चलूँ उस तरफ! मैंने देखा है, तुम्हें दिखा दूँ! आस्तिक को तो फिकर ही नहीं है देखने की। वह तो कहता है, हम तो मानते ही हैं, झंझट में क्या पड़ना!

हम तो पहले ही से मानते हैं। यह उसकी तरकीब है परमात्मा से बचने की। उसकी परमात्मा में उत्सुकता नहीं है। इतनी भी उत्सुकता नहीं है कि इंकार करे। वह परमात्मा को दो कौड़ी की बात मानता है, वह कहता है, क्या जरूरत है फिकर करने की? असल में परमात्मा की झंझट में वह पड़ना नहीं चाहता, इसलिए कहता है कि होगा, जरूर होगा, होना ही चाहिए; जब सब लोग कहते हैं तो जरूर ही होगा। इसको बातचीत के योग्य भी नहीं मानता है। इस पर समय नहीं गँवाना चाहता है। वह कहता है, यह एक औपचारिक बात है, कभी हो आए चर्च, कभी हो आए मंदिर, कभी रामलीला देख ली–सब ठीक है। अच्छा है, सामाजिक व्यवहार है।

सबके साथ रहना है तो सबके जैसा होकर रहने में सुविधा है। सब मानते हैं, हम भी मानते हैं। अब भीड़ के साथ झंझट कौन करे? औ झंझट करने-योग्य यह बात भी कहाँ है? इसमें इतना बल ही कहाँ है कि इसमें हम समय खराब करें?
तुम देखते हो, लोग राजनीति का ज्यादा विवाद करते हैं, बजाय धर्म के। बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सी पार्टी ठीक! बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सा सिद्धांत ठीक! धर्म का तो विवाद ही खो गया है! धर्म का विवाद ही कौन करता है? अगर तुम एकदम बैठे हो कहीं होटल में, क्लबघर में और एकदम उठा दो कि ईश्वर है या नहीं; सब कहेंगे कि भई होगा, बैठो, शांत रहो, जरूर होगा, मगर यहाँ झंझट तो खड़ी न करो। कौन इस बकवास में पड़ना चाहता है?

नास्तिक अभी भी उत्सुक है। नास्तिक का मतलब यह है–वह यह कहता है कि परमात्मा अभी भी विचारणीय प्रश्न है; खोजने-योग्य है; जिज्ञासा-योग्य है; अभियान-योग्य है। जाऊँगा, खोजूँगा। नास्तिक यह कह रहा है कि मैं दावँ पर लगाने को तैयार हूँ। समय, तो समय लगाऊँगा।

मेरे अपने देखे जगत में जो परम आस्तिक हुए हैं, उनकी यात्रा परम नास्तिकता से ही होती है, क्योंकि सचाई से ही सचाई की खोज शुरू होती है। कम-से-कम इतनी सचाई तो बरतो कि जो नहीं जानते हो उसको कहो मत कि मानता हूँ।

नास्तिक की भूल कहाँ होती है? नास्तिक की भूल इस बात में नहीं है कि वह ईश्वर को नहीं मानता, नास्तिक की भूल इस बात में है कि ईश्वर के न होने को मानने लगता है । तब भूल हो जाती है। फर्क समझ लेना।

अगर आस्तिक ईमानदार है तो वह इतना ही कहेगा कि मुझे पता नहीं, मैं कैसे कहूँ कि है, मैं कैसे कहूँ कि नहीं है? अपना अज्ञान घोषणा करेगा; लेकिन ईश्वर के संबंध में हाँ या नहीं का कोई निर्णीत जवाब नहीं देगा। यह असली नास्तिक है। जो नास्तिक कहता है कि मुझे पता है कि ईश्वर नहीं है, यह झूठा नास्तिक है। यह आस्तिक जैसा हि झूठा है। आस्तिक ने एक तरह की झूठ पकड़ी है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर है, इसने दूसरी तरह की झूठ पकड़ी है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर नहीं है। दोनों झूठ हैं।

असली नास्तिक कहता है, मुझे पता नहीं, मैं अज्ञानी हूँ, मैंने अभी नहीं जाना है, इसलिए मैं कोई भी निर्णय नहीं दे सकता, मैं कोई निष्कर्ष घोषित नहीं कर सकता।
मगर यही तो खोजी की अवस्था है। यही तो जिज्ञासा का आविर्भाव है। यहीं से तो जीवन की यात्रा शुरू होती है।

तुम कहते हो, ‘आत्मा-परमात्मा, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, मंत्र-तंत्र , चमत्कार- भाग्यादि में मेरा कतई विश्वास नहीं है। मैं निपट नास्तिक हूँ।’ तो तुम ठीक आदमी के पास आ गए। अब तुम्हें कहीं जाने की कोई जरूरत न रही। मैं भी महा नास्तिक हूँ। दोस्ती बन सकती है। मैं तुम्हारी ‘नहीं’ को ‘हाँ’ में बदल दूँगा। मगर यह बदलाहट किसी विश्वास के आरोपण से नहीं–यह बदलाहट किसी अनुभव से। और वह अनुभव शुरू हो गया है। किरण उतरने लगी है। तुम कहते हो, ‘आपके प्रवचनों में अनोखा आकर्षण है तथा मन को आनंद से अभिभूत प्रेरणाएँ मिलती हैं।’ शुरू हो गयी बात, क्योंकि परमात्मा आनंद का ही दूसरा नाम है। परमात्मा कुछ और नहीं है, आनंद की परम दशा है, आनंद की चरम दशा है। परमात्मा सिर्फ एक नाम है आनंद के चरम उत्कर्ष का। शुरू हो गयी बात।

तुम मुझे सुनने लगे, डोलने लगे मेरे साथ; तुम मुझे सुनने लगे, मस्त होने लगे; तुम मेरी सुराही से पीने लगे; शुरू हो गयी बात। तुम रंगने लगे मेरे रंग में। अब देर की कोई जरूरत नहीं है। तुम संन्यासी बनो। बनना ही होगा! अब बचने का कोई उपाय भी नहीं है। अब भागने की कोई सुविधा भी नहीं है।

मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है। आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं। नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं। कहने-भर का भेद है। आखिरी अवस्था में ‘हाँ’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं।

🎷🎷🎷🎷🎷🎷ओशो🎷🎷🎷🎷🎷🎷

💖जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य है जो स्वयं ही जाने जाते है💖

jindagi me kuchh jeevant satya hai jo svayam hi jane jate hai

jindagi me kuchh jeevant satya hai jo svayam hi jane jate hai

 

एक मुसलमान फकीर हुआ, नसरुद्दीन वह एक नदी पार कर रहा था एक नाव में बैठ कर। रास्ते में मल्लाह और नसरुद्दीन कि बातचीत भी होती रही नसरुद्दीन बड़ा ज्ञानी आदमी समझा जाता था।

ज्ञानियों को हमेशा कोशिश रहती है किसी को अज्ञानी सिद्ध करने का मौका मिल जाए तो वह छोड़ नहीं सकते। तो उसने मल्लाह से पूछा कि भाषा जानते हो? मल्लाह ने कहा :भाषा… पढना-लिखना मुझे पता नहीं, जीतना बोलता हूं उतना ही जानता हूँ।

नसरुद्दीन ने कहा :तेरा चार आना जीवन बेकार चला गया। क्योंकि जो पढ़ना नहीं जानते क्या उसे ज्ञान मिल सकता है?
कहीं ज्ञान मिला है। मल्लाह चुपचाप हंसने लगा।

थोड़ी चले और नसरुद्दीन ने पूछा तुझे गणित आता है? मल्लाह ने कहा मुझे गणित नहीं आता है। ऐसे दो और दो चार जोड़ लेता हूँ। नसरुद्दीन ने कहा तेरा चार आना जीवन और बेकार चला गया। जीसे जोड़ नहीं आता वह जिंदगी में क्या जोड़ सकेगा। तेरा आठ आना जीवन बेकार गया।

फिर जोर का तुफान और आंधी आई और नाव उलटने करीब हो गई। उस मल्लाह ने पूछा :आपको तैरने आता है?
नसरुद्दीन ने कहा :मुझे तैरने नहीं आता।
मल्लाह ने कहा :आप की सोलह आने जिंदगी बेकार जाती है।

मै तो चला। मुझे गणित नहीं आता और न मुझे भाषा आती है, लेकिन मुझे तैरना आता है। मै तो चला।

जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य है जो स्वंय हीं जाने जाते है, जो शास्त्र से नही जाने जा सकते। आत्मा का सत्य या परमात्मा का सत्य स्वंय ही जाना जा सकता है और कोई जानने का उपाय नहीं है।

🌼🌼🌼🌼🌼अंतरयात्रा🌼🌼🌼🌼🌼

🌺Rajneesh Osho🌺

🌹जीवन में व्रत का क्या मूल्य है? 🌹

jeevan me vrat ka kya mulya hai

jeevan me vrat ka kya mulya hai

व्रत का मूल्य तो जरा भी नहीं, बोध का मूल्य है। व्रत का तो अर्थ ही होता है, बोध की कमी है। उसकी परिपूर्ति तुमने व्रत से कर ली।

तुमने देखा, झूठे आदमी ज्यादा कसमें खाते हैं। हर बात में कसम खाने को तैयार रहते हैं। झूठा आदमी कसम के सहारे चलता है। वह अपनी झूठ को कसम के सहारे सच बताना चाहता है।

पश्चिम में ईसाइयों का एक छोटा सा रहस्यवादी संप्रदाय है, क्वेकर। वे अदालत में भी कसम खाने को राजी नहीं होते। सैकड़ों बार तो उनको इसीलिए सजा भोगनी पड़ी है, क्योंकि अदालत में वह कसम खानी ही पडेगी बाइबिल हाथ में लेकर कि मैं सच बोलूंगा। लेकिन क्वेकर्स का कहना भी बड़ा सही है, वे कहते हैं कि मैं सच बोलूंगा, यह भी कोई कसम खाने की बात है! और अगर मैं झूठ बोलने वाला हूं तो कसम भी झूठी खा लूंगा। यह बात ही फिजूल है, यह बात ही मूढ़तापूर्ण है। एक झूठे आदमी से कहो कि यह हाथ में लेकर कुरान या बाइबिल या गीता कसम खा लो कि सच बोलोगे। अब अगर वह आदमी सच में झूठा है, तो वह कसम खा लेगा कि लाओ, कसम खा लेता हूं। झूठ बोलने वाले आदमी को झूठी कसम खाने में कौन सी बाधा है! और सच बोलने वाला आदमी जरूर कहेगा कि मैं कसम क्यों खाऊं, क्योंकि मैं जो बोलता हूं वह सच ही है। कसम खाने का तो मतलब होगा कि बिना कसम खाए जो बोलता हूं वह झूठ है।

इसलिए क्वेकर कसम नहीं खाते। वे कहते हैं, कसम खाने का तो मतलब ही यह हुआ कि बिना कसम खायी गयी बात झूठ है। हम सच ही बोलते हैं, कसम और गैर कसम का कोई सवाल नहीं है!

व्रत का अर्थ होता है, कसम। व्रत का अर्थ होता है, समाज के सामने कसम। तुम गए मंदिर में, साधु—संन्यासी के पास, मुनि महाराज के पास, समाज की भीड़ में तुमने कसम खा ली। यह कसम तुम भीड़ में खाते हो। क्यों? क्योंकि तुम्हें अपने पर तो भरोसा नहीं है। तुम जानते तो हो कि अगर सबके सामने कसम खा ली कि अब धूम्रपान न करेंगे, तो अब प्रतिष्ठा का सवाल हो गया। अब अगर समाज में कहीं कोई धूम्रपान करता हुआ पकड़ लेगा, तो बेइज्जती होगी। तो तुमने धूम्रपान के खिलाफ अहंकार को खड़ा कर दिया। कसम का क्या मतलब है?

कसम का मतलब यह हुआ कि अब अहंकार को चोट लगेगी। लोग कहेंगे, अरे, तुमने तो कसम खा ली थी धूम्रपान न करने की, अब कर रहे हो! शर्म नहीं आती! मुनि महाराज के पास किस मुंह को लेकर जाओगे? मंदिर में कैसे प्रवेश करोगे? बाजार में कैसे निकलोगे? प्रतिष्ठा दाव पर लगा दी। कसम का मतलब यह है कि अब सबसे कह दिए कि आज से मैं सिगरेट नहीं पीऊंगा, कि धूम्रपान नहीं करूंगा। अब सारे लोग तुम्हारे पहरेदार हो गए, यह मतलब है कसम का। अब जो भी देखेगा छोटे से लेकर बड़े तक, वह कहेगा, अरे भाई! क्या कर रहे हो! कल तक कोई भी नहीं कह सकता था, क्योंकि तुम अपने मालिक थे। तुमने मालकियत इनके हाथ में दे दी। कल तक हो सकता था पत्नी से बचाकर पी लेते थे, पिता से बचाकर पी लेते थे, अब तुमको सबसे बचाकर पीना होगा, यह बहुत कठिन मामला है! कहां पीओगे? कैसे बचाओगे?

☘ एस धम्मो सनंतनो ☘

✍🏻Rajneesh Osho✍🏻

जीवंत होने का अर्थ है चुनौती ताजी रहे, रोज नए की खोज जारी रहे

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osho-ka-aaj-ka-vichar

जीवंत होने का अर्थ है: चुनौती ताजी रहे, रोज नए की खोज जारी रहे। क्योंकि नए की खोज में ही तुम अपने भीतर जो छिपे हैं स्वर, उन्हें मुक्त कर पाओगे। नए की खोज में ही तुम नए हो पाओगे। जैसे ही नए की खोज बंद होती है कि तुम पुराने हो गए, जराजीर्ण हो गए, खंडहर हो गए। एक क्षण को रुकती है नदी की धार और गंदी होनी शुरू हो जाती है। पवित्रता तो सदा बहते रहने का नाम है। तभी तक धार पवित्र और निर्मल रहती है जब तक बहती रहती है।

💐💐Rajneesh Osho💐💐

आज का दिन व्यर्थ में बर्बाद मत करो

aaj ka din vyarth me barbaad mat karo

aaj ka din vyarth me barbaad mat karo

 

यदि किसी भूल के कारण
कल का दिन दु:ख में बीता है
तो उसे याद कर
आज का दिन व्यर्थ में बर्बाद मत करो।

स्वामी विवेकानंद

yadi kisi bhul ke karan
kal ka din dukh me beeta hai
to use yaad kar
aaj ka din vyarth me barbaad mat karo.

Swami Vivekananda

पत्नी की देह परमात्मा की पहली परत

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patni ki deh

 

तुम जब अपनी पत्नी में डूबते हो या अपने पति में डूबते हो, तब भी तुम परमात्मा का ही रस लेना चाह रहे हो।

सिर्फ तुमने ज़रा लंबा रास्ता चुना है देह, फिर देह के भीतर मन है, और मन के भीतर आत्मा है–और आत्मा के भीतर परमात्मा छिपा है। तुम पत्नी की देह में ही उलझ गए, तो ऐसा हुआ कि छीलने चले थे प्याज की गांठ को, बस पहली ही पर्त उघाड़ पाए।

पत्नी के मन तक पहुंचो–दूसरी पर्त उघड़ेगी। पत्नी की आत्मा तक पहुंचो–तीसरी पर्त उघड़ेगी। और पत्नी के भीतर भी तुम्हें परमात्मा के दर्शन होंगे, पत्नी मंदिर बन जाएगी।
और जब तक पत्नी मंदिर बन जाए और पति मंदिर न बन जाए, तब तक समझना कि प्रेम था ही नहीं, वासना ही थी।

🌎 अजहूं चेत गंवार 🌎

🌹Rajneesh Osho quotes🌹

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मन को निस्तरंग करो

Osho quotes in hindi

Osho quotes in hindi

 

काश! हम शांत हो सकें और भीतर गूंजते शब्दों और ध्वनियों को शून्य कर सकें, तो जीवन में जो सर्वाधिक आधारभूत है, उसके दर्शन हो सकते हैं। सत्य के दर्शन के लिए शांति के चक्षु चाहिए। उन चक्षुओं को पाये बिना जो सत्य को खोजता है, वह व्यर्थ ही खोजता है।
साधु रिझांई एक दिन प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा, ”प्रत्येक के भीतर, प्रत्येक के शरीर में वह मनुष्य छिपा है, जिसका कोई विशेषण नहीं है- न पद है, न नाम है। वह उपाधि शून्य मनुष्य ही शरीर की खिड़कियों में से बाहर आता है। जिन्होंने यह बात आज तक नहीं देखी है, वे देखें, देखें। मित्रों! देखो! देखो!” यह आवाहन सुनकर एक भिक्षु बाहर आया और बोला,”यह सत्य पुरुष कौन है? यह उपाधि शून्य सत्ता कौन है?” रिंझाई नीचे उतरा और भिक्षुओं की भीड़ को पार कर उस भिक्षु के पास पहुंचा। सब चकित थे कि उत्तर न देकर, वह यह क्या कर रहा है? उसने जाकर जोर-से उस भिक्षु को पकड़ कर कहा, ”फिर से बोलो।” भिक्षु घबड़ा गया और कुछ बोल नहीं सका। रिंझाई ने कहा,”भीतर देखो। वहां जो है- मौन और शांत- वही वह सत्य पुरुष है। वही हो तुम। उसे ही पहचानो। जो उसे पहचान लेता है, उसके लिए सत्य के समस्त द्वार खुल जाते हैं।”
पूर्णिमा की रात्रि में किसी झील को देखो। यदि झील निस्तरंग हो तो चंद्रमा का प्रतिबिंब बनता है। ऐसा ही मन है। उसमें तरंगें न हों, तो सत्य प्रतिफलित होता है। जिसके मन तरंगों से ढका है, वह अपने हाथों सत्य से स्वयं को दूर किये है। सत्य तो सदा निकट है, लेकिन अपनी अशांति के कारण हम सदा उसके निकट नहीं होते हैं।

🚶‍पथ के प्रदीप🚶

🙏🏻🌹 ओशो…. ✍🏻

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नथनी दिनी यार ने तो चिंतन बारम्बार

kabirdas-ke-dohe

kabirdas-ke-dohe

नथनी दिनी यार ने तो
चिंतन बारम्बार,
और
नाक दिनी करतार ने
प्यारे उनको तो दिया बिसार

🌻कबीरदास🌻

शून्य में लीन होते ही अनहद सुनाई देगा

osho anmol vachan

osho anmol vachan

जैसे धरती सागर में डूब जाए और प्रलय हो जाए,
ऐसे ही तुम जब अपने ही शून्य में लीन हो जाते हो तब अनहद सुनाई पड़ता है;
तब उसकी मुरली की तान सुनाई पड़ती है।
मंदिरों में तुमने कृष्ण की मूर्ति बना रखी है मुरली लिए हुए!

लाख जतन करो! पूजा पाठ कर्म क्रियाएँ करो!

कुछ भी न होगा। वह तो प्रतीक है।
वह तो केवल काव्य प्रतीक है, प्यारा प्रतीक है।
समझो-बूझो तो बड़ा प्यारा है।
और ऐसे ही सिर पटकते रहो,
आरती उतारते रहो कर्म कांड करते रहो,
वह तो बिल्कुल व्यर्थ है!

शून्य ही अनहद नाद सुनने का रास्ता है…….!!

🌹Osho🌹


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