स्वयं को खोजो और स्वयं को पाओ!

Osho vidhardhara

Osho vidhardhara

परमात्मा के द्वार पर केवल उन्ही का स्वागत है जो स्वयं जैसे है! उस द्वार से राम तो निकल सकते है, लेकिन रामलीला के राम का निकलना संभव नहीं है! और जब भी कोई बाह्य आदर्शो से अनुप्रेरित हो स्वयं को ढालता है, तो वह रामलीला का राम ही बन सकता है! यह दूसरी बात है कि कोई उसमें ज्यादा सफल हो जाता है, कोई कम! लेकिन अंतत: जो जितना ज्यादा सफल है, वह स्वयं से उतनी ही दूर निकल जाता है! रामलीला के रामों की सफलता वस्तुत: स्वयं की विफलता ही है! राम को, बुद्ध को या महावीर को ऊपर नहीं ओढ़ा जा सकता! जो ओढ़ लेता है, उसके व्यक्तित्व में न संगीत होता है, न स्वतंत्रता, न सौंदर्य, न सत्य!
परमात्मा उसके साथ वही व्यवहार करेगा, जो स्मार्टा के एक बादशाह ने उस व्यक्ति के साथ किया था जो बुलबुल-जैसी आवाजें निकालने में इतना कुशल हो गया था कि मनुष्य की बोली उसे भूल ही गई थी! उस व्यक्ति की बड़ी ख्याति थी और लोग, दूर-दूर से उसे देखने और सुनने जाते थे! वह अपने कौशल का प्रदर्शन बादशाह के सामने भी करना चाहता था! बड़ी कठिनाई से वह बादशाह के सामने उपस्थित होने की आज्ञा पा सका! उसने सोचा था कि बादशाह उसकी प्रशंसा करेंगे और पुरस्कारों से सम्मानित भी! अन्य लोगो द्वारा मिली प्रशंसा और पुरस्कारों के कारण उसकी यह आशा उचित ही थी! लेकिन बादशाह ने कहा: महानुभाव, मैं बुलबुल को ही गीत गाते सुन चूका हूं, मैं आपसे बुलबुल के गीतों को सुनने की नहीं, वरन उस गीत को सुनने की आशा और अपेक्षा रखता हूं, जिसे गाने के लिए, आप पैदा हुए है! बुलबुलों के गीतों के लिए बुलबुलें ही काफी है! आप जाये और अपने गीत को तैयार करें और जब वह तैयार हो जाये तो आवें! मैंआपके स्वागत के लिए तैयार रहूंगा और आपके लिए पुरस्कार भी तैयार रहेंगे!
निशचय ही जीवन दूसरों की नक़ल के लिए नहीं, वरन स्वयं के बीज में जो छिपा है, उसे ही वृक्ष बनाने के लिए है! जीवन अनुकृति नहीं, मौलिक सृष्टि है!

🕊💚मिट्टी के दीये 💚🕊

Rajneesh Osho

तुम्हारे पास विराट ऊर्जा है

osho ke pravachan hindi

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osho ke pravachan hindi

🌹जिस दिन तुम अपनी सब इच्छाएं छोड़ दोगे, अचानक तुम पाओगे, तुम्हारे पास विराट ऊर्जा है🌹

 

मैंने सुना है, एक अमीर आदमी के पास एक गरीब आदमी मिलने गया। वह अमीर आदमीने अपने पास एक सोने का पीकदान रखा हुआ था। लाखों रुपए का होगा; उस पर हीरे जड़े थे। और वह उसमें बार—बार पान की पीक थूक रहा था। वह गरीब को बड़ा दुख हुआ, उसे बड़ा क्रोध भी आया। जिंदगी भर परेशान हो गया वह लक्ष्मी की तलाश करते—करते।
आखिर उससे न रहा गया, उसने एक लात मारी पीकदान में और कहा, ससुरी! यहां थुकवाने को बैठी है। हम जिंदगीभर पीछे पड़े रहे, प्रार्थना की, पूजा की, सपने में भी दर्शन न दिए। वह अमीर आदमी हंसने लग गया। उसने कहा, ऐसी ही दशा पहले हमारी भी थी।
जब तक हम भी पीछे लगे फिरे, कुछ भी हाथ न आया। जब से हम मुड़ गए और जब से हम पीछे फिरना छोड़ दिए, चीजें अपने आप चली आती हैं। तुम्हारी सब इच्छाएं जब तुम छोड़ दोगे, अचानक तुम पाओगे, तुम्हारे पास विराट ऊर्जा है। तब तुम इच्छा न करना चाहोगे और इच्छाशक्ति होगी।
जब तुम विचार न करना चाहोगे, तब विचारशक्ति होगी। जब तुम जीना न चाहोगे, तब तुम्हारे पास अमर जीवन होगा।जब तुम मिटने को राजी होओगे, तुम्हें मिटाने वाली कोई शक्ति नहीं।जब तुम सबसे पीछे खड़े हो जाओगे, तुम सबसे आगे हो जाओगे।
जीसस ने कहा है, जो यहां सबसे पीछे हैं, वे मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम हो जाते है। और लाओत्सु ने कहा है, मुझे कोई हरा न सकेगा, क्योंकि मुझे जीत की कोई आकांक्षा नहीं है। ऐसी विजय अंतिम हो जाती है, परम हो जाती है।

जीवन का यह सूत्र बड़ा बहुमूल्य है। जिसने इसे जाना, उसने बहुत कुछ जाना। और जो इसे चूकता रहा, वह जीवन के आसपास चक्कर मारता रहेगा भिखमंगे की तरह, वह कभी इस महल में प्रवेश न पा सकेगा।

💥एस धम्मो सनंतनो, भाग -4💥

!!Acharya Rajneesh Osho!!

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आदमी खुद पर नहीं हँस सकता

osho ke anmol vachan

Osho Quotes on Life

osho ke anmol vachan

जीवन हँसने-हसाने का अवसर है। आदमी खुद पर हँस नहीं सकता, क्योंकि वह मूर्ख बनने से डरता है।
लेकिन मूर्खता में क्या खराबी है? ज्ञानी बनने की बजाय मूर्ख बनकर जीना ज्यादा बेहतर है।
सच्चा मूर्ख वह है जो किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता। मूर्ख आदमी अकारण हँसता रहता है।
उसमें मिथ्या अहँकार नहीं होता। वह सहज, सरल होता है।
यह बहुत बड़ा वरदान है।
क्योंकि हमारी जिंदगी इतनी बोझिल है कि हँसने के कारण खोजने जाएं तो मिलने बहुत मुश्किल हैं।
जो अकारण हँस सकता है उसका जीवन मधुमास बन जाता है; उसके जीवन में आनंद की फुलझड़ियाँ छूटती हैं।
अकारण ही।

Rajneesh Osho

परमात्मा शराब है

parmatma sharab hai

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parmatma sharab hai

परमात्मा शराब है।

हां, शराब जब पी लोगे तो तुम्हारे जीवन में जो अलमस्ती होगी, प्रार्थना उसी अलमस्ती का एक रंग है। नृत्य होगा, गीत होगा; वे सब उसी अलमस्ती से निकलेंगे। वे उसी अलमस्ती की धाराएं हैं। अलमस्ती की गंगोत्री से प्रार्थना की गंगा पैदा होती है। मीरा को हुई। लोग सोचते हैं, मीरा ने गा-गा कर परमात्मा को पा लिया। गलत सोचते हैं, बिलकुल गलत सोचते हैं! उन्हें जीवन का गणित आता ही नहीं। मीरा ने परमात्मा को पाया, इसलिए गाया। गा सकी–इसलिए नहीं कि परमात्मा को गा-गा कर पाया जा सकता है; लेकिन परमात्मा को पा लो तो बिना गाए नहीं रहा जा सकता।

अगर गाने से परमात्मा मिलता हो तो लता मंगेशकर को मीरा से पहले मिल जाए। लता मंगेशकर को पीएच.डी. की उपाधि मिल सकती है, परमात्मा नहीं। यह गीत कंठ तक है। कंठ जिनके सुमधुर हैं, उनको कोकिल-कंठी कहो ठीक। और मीरा का हो सकता है गीत इतना सुमधुर न भी रहा हो, होश कहां! मात्रा-छंद की भूल होती हो, होश कहां! मीरा ने कहा ही है: सब लोक लाज खोई! मीरा सड़कों पर नाचने लगी; राजघराने की महिला थी, रानी थी। प्रियजन-परिजन चिंतित हुए, बदनामी हो रही थी। जहर भेजा।

कहानी कहती है कि मीरा जहर पी गई और मरी नहीं। अगर यह बात सच हो कि मीरा जहर पीकर मरी नहीं तो वैसे ही समझ लेना जैसा लाओत्सु का शराबी गाड़ी से गिरा और चोट नहीं खाया। बस वही बात है। पी गई होगी शराब, पी गई होगी जहर, जो भी भेजा होगा पी गई होगी; लेकिन उसे खयाल ही नहीं होगा, बचाव ही नहीं होगा। बचने वाला तो जा ही चुका; वह अहंकार तो कभी का विदा हो चुका है।

अब तो परमात्मा था। और परमात्मा जहर पीए तो मरे? अब तो प्रार्थना थी। और प्रार्थना से तो जहर भी जुड़े तो अमृत हो जाए। और प्रार्थना के साथ तो अंधेरे का भी संग-साथ हो जाए तो रोशन हो जाए। नहीं, मैं ऐसा कहता हूं कि मीरा ने परमात्मा को पाया, इसलिए गा सकी। प्रार्थना आत्यंतिक फूल है। पहले वृक्ष तो लगने दो परमात्मा के अनुभव का।

उत्सव आमार जाति आनंद आमार गोत्र # 3

!!Rajneesh Osho!!

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प्रेम क्या है?

prem kya hai osho

What is Love by Osho

prem kya hai osho

प्रेम नहीं किया और पुछते हो कि प्रेम क्या है?

अब कैसे समझाएं उसे, कैसे जतलाएं उसे? ऐसे जैसे अंधे ने पूछा, प्रकाश क्या है? अब क्या है उपाय बतलाने का? और जो भी हम बताने चलेंगे, अंधे को और उलझन में डाल जायेगा। अंधा समझेगा तो नहीं, और चक्कर में, और अड़चन में पड़ जायेगा।

विरह अनुभूति है; प्रेम किया हो तो जान सकते हो। और जिसने प्रेम किया है, वह विरह जान ही लेगा। प्रेम के दो पहलू हैं। पहली मुलाकात जिससे होती है वह विरह और दूसरी मुलाकात जिससे होती है वह मिलन।

प्रेम के दो अंग हैं –
विरह और मिलन।
विरह में पकता है भक्त और मिलन में परीक्षा पूरी हो गयी, पुरस्कार मिला। विरह तैयारी है, मिलन उपलब्धि है। आंसुओ से रास्ते को पाटना पड़ता है मंदिर के, तभी कोई मंदिर के देवता तक पहुंचता है। रो—रो कर काटनी पड़ती है यह लंबी रात, तभी सुबह होती है। और जितनी ही आंखें रोती हैं, उतनी ही ताजी सुबह होती है! और जितने ही आंसू बहे होते हैं, उतने ही सुंदर सूरज का जन्म होता है।

तुम्हारे विरह पर निर्भर है कि तुम्हारा मिलन कितना प्रीतिकर होगा, कितना गहन होगा, कितना गंभीर होगा। सस्ते में जो हो जाये, वह बात भी सस्ती ही रहती है।

इसलिए परमात्मा मुफ्त में नहीं मिलता, रो—रो कर मिलना होता है। और आंसू भी साधारण आंसू नहीं, हृदय ही जैसे पिघल—पिघल कर आंसुओ से बहता है! जैसे रक्त आंसू बन जाता है। जैसे प्राण ही आंसू बन जाते हैं।

!!ओशो!!

मैं किसी को शिष्य नहीं बना सकता हूँ, क्योंकि मैं कोई गुरु नहीं हूँ

osho ke anmol vachan

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osho ke anmol vachan

पहली बात, अगर कोई व्यक्ति मेरे जैसा होने की कोशिश करे तो मैं उसे रोकूंगा। उसे मैं कहूंगा, कि मेरे जैसा होने की कोशिश आत्मघात है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति स्वयं जैसे होने की कोशिश की यात्रा पर निकले तो मेरी शुभकामनाएं उसे देने में मुझे कोई हर्ज नहीं है। जो संन्यासी चाहते हैं कि मैं परमात्मा के मार्ग पर उनकी यात्रा का गवाह बन जाऊं, विटनेस बन जाऊं तो उनका गवाह बनने में मुझे कोई एतराज नहीं है, लेकिन मैं गुरु किसी का भी नहीं हूं। मेरा कोई शिष्य नहीं है, मैं सिर्फ गवाह हूं। अगर कोई मेरे सामने संकल्प लेना चाहता है कि मैं संन्यास की यात्रा पर जा रहा हूं तो मुझे गवाह बन जाने में कोई एतराज नहीं है, लेकिन अगर कोई मेरा शिष्य बनने आए तो मुझे भारी एतराज है।

मैं किसी को शिष्य नहीं बना सकता हूं। क्योंकि मैं कोई गुरु नहीं हूं। अगर कोई मेरे पीछे चलने आए तो मैं उसे इनकार करूंगा, लेकिन कोई अगर अपनी यात्रा पर जाता हो और मुझसे शुभकामनाएं लेने आए तो शुभकामनाएं देने की भी कंजूसी करूं, ऐसा सम्भव नहीं है। फिर भी.. यह आपको दिखाई पड़ गया है—मैं गैरिक वस्त्र नहीं पहनता हूं मैंने कोई गले में माला नहीं डाली हुई है। फिर उनके द्वारा मेरी नकल का कोई कारण नहीं है!

फिर भी पूछते हैं आप कि किसी को भी बिना उसकी पात्रता का खयाल किए मैं उसके संन्यास को स्वीकार कर लेता हूं। जब परमात्मा ही हम सबको हमारी बिना किसी पात्रता के स्वीकार किए है तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन हो सकता हूं! हम सबकी पात्रता क्या है जीवन में! और संन्यास के लिए एक ही पात्रता है कि आदमी अपनी अपात्रता को पूरी विनम्रता से स्वीकार करता है। इसके अतिरिक्त कोई पात्रता नहीं है।

अगर कोई आदमी कहता है कि मैं पात्र हूं मुझे संन्यास दें तो मैं हाथ जोड़ लूंगा, क्योंकि जो पात्र है उसको संन्यास की जरूरत ही नहीं। और जिसे यह खयाल है कि मैं पात्र हूं वह संन्यासी नहीं हो पाएगा, क्योंकि संन्यास विनम्रता, ह्यूमिलिटी का फूल है। वह विनम्रता में ही खिलता है। जो आदमी पात्रता के सर्टिफिकेट लेकर परमात्‍मा के पास जाएगा, शायद उसके लिए दरवाजे नहीं खुलेंगे। लेकिन जो दरवाजे पर अपने आंसू लेकर खड़ा हो जाएगा और कहेगा मैं अपात्र हूं मेरी कोई भी पात्रता नहीं है कि मैं द्वार खुलवाने के लिए कहूं; लेकिन फिर भी प्रयास है, आकांक्षा है; फिर भी लगन है, भूख है; फिर भी दर्शन की अभीप्सा है दरवाजे उसके लिए खुलते हैं.

मैं कहता आँखन देखी

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प्रेम को प्रार्थना बनाओ

osho ke anmol vachan

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osho ke anmol vachan

 

प्रेम से भरी हुई आँख जहाँ पड़ेगी
वहीं मंदिर निर्मित हो जाएंगे
जहाँ प्रेम से भरा हुआ हृदय धड़केगा,
वहीं एक और नया काबा बन जाएगा,
एक नयी काशी पैदा होगी,
क्योंकि जहाँ प्रेम है,
वहाँ परमात्मा प्रकट हो जाता है।
प्रेम भरी आँख कण-कण मे
परमात्मा को देख लेती है।
**प्रेम को प्रार्थना बनाओ**

*ओशो*

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मित्रता का मतलब

osho amritvani

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osho amritvani

मित्रता का मतलब है कि
तुमने किसी अन्य व्यक्ति को
स्वयं से ज्यादा महत्वपूर्ण माना
यह व्यापार नहीं है
यह अपने आप में पवित्र प्रेम है

!!ओशो!!

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बुढ़ापे में धार्मिक क्यों हो जाते हैं?

Rajneesh osho pravachan

Rajneesh osho pravachan

मनोवैज्ञानिक कहते है, अधिक लोग बूढ़े होकर धार्मिक होने शुरू हो जाते हैं, लोभ के कारण। जवान आदमी से मौत जरा दूर होती है। अभी दूसरे लोक की इतनी चिंता नहीं होती। अभी आशा होती है कि यहीं पा लेंगे, जो पाने योग्य है। यहीं कर लेंगे इकट्ठा। लेकिन मौत जब करीब आने लगती है, हाथ—पैर शिथिल होने लगते है और संसार की पकड़ ढीली होने लगती है इंद्रियों की, तो भीतर का लोभ कहता है, यह संसार तो गया ही, अब दूसरे को मत छोड़ देना।’माया मिली न राम’। कहीं ऐसा न हो कि माया भी गयी, राम भी गये। तो अब राम को जोर से पकड़ लो।

इसलिए बूढ़े लोग मंदिरों, मस्जिदों की तरफ यात्रा करने लगते हैं। तीर्थ यात्रियों में देखें, बूढ़े लोग तीर्थ की यात्रा करने लगते है। ये वही लोग है जिन्होंने जवानी में तीर्थ के विपरीत यात्रा की है।

कार्ल गुस्ताव जुंग ने, इस सदी के बड़े से बड़े मनोचिकित्सक ने कहां है, कि मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्तियों में जिन लोगों की मैंने चिकित्सा की है, उनमें अधिकतम लोग चालीस वर्ष के ऊपर थे। और उनकी निरंतर चिकित्सा के बाद मेरा यह निष्कर्ष है कि उनकी बीमारी का एक ही कारण था कि पश्‍चिम में धर्म खो गया है। चालीस साल के बाद आदमी को धर्म की वैसी ही जरूरत है, जुंग ने कहां है, जैसे जवान आदमी को विवाह की। जवान को जैसे कामवासना चाहिए, वैसे बूढ़े को धर्म—वासना चाहिए। जुंग ने कहां है, अधिक लोगों कि परेशानी यह थी कि उनको धर्म नहीं मिल रहा है। इसलिए पूरब में कम लोग पागल होते हैं, पश्‍चिम में ज्यादा लोग। पूरब में जवान आदमी भला पागल हो जाये, बूढा आदमी पागल नहीं होता। पश्‍चिम में जवान आदमी पागल नहीं होता, बूढ़ा आदमी पागल हो जाता है। जैसे—जैसे जवानी हटती है, वैसे—वैसे रिक्तता आती है। यौवन की वासना खो आती है और बुढ़ापे की वासना को कोई जगह नहीं मिलती। मन बेचैन और व्यथित हो जाता है।

हमारा बूढ़ा सोचता है आत्मा अमर है, आश्वासन होते है। हमारा बूढ़ा सोचता है, माला जप रहे हैं, राम नाम ले रहे हैं, स्वर्ग निश्‍चित है। सांत्वना मिलती है। पश्‍चिम के बूढ़े को कोई भी सांत्वना नहीं रही। पश्‍चिम का बूढा बड़े कष्ट में है, बड़ी पीड़ा में है। सिवाय मौत के आगे कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता है उस पार।

उस पार लोभ को कोई मौका नहीं। जवानी के लोभ विषय खो गये और बुढ़ापे के लोभ के लिए कोई आब्जेक्ट, कोई विषय नहीं मिल रहे। मौत का तो लोभ हो नहीं सकता अमरता का हो सकता है। बूढ़ा आदमी शरीर का क्या लोभ करेगा! शरीर तो खो रहा है, हाथ से खिसक रहा है। तो शरीर के ऊपर, पार कोई चीज हो तो लोभ करे।

लोभ अदभुत है, विषय बदल ले सकता है। धन ही पर लोभ हो, ऐसा आवश्यक नहीं। लोभ किसी भी चीज पर हो सकता है।

महावीर वाणी, भाग-1, प्रवचन-25, ओशो

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मनुष्य की सबसे बड़ी कृति

osho anmol vachan

Rajneesh Osho Quotes in Hindi

osho anmol vachan

मनुष्य

मनुष्य की सबसे बड़ी कृति

स्वयं मनुष्य है ।

और मनुष्य का सबसे बड़ा सृजन

स्वयं का निर्माण है ।

और आप कुछ भी बनाये,

वह बनाना किसी काम का नहीं है ।

वह सब पानी पर खींची गई

लकीरों की तरह मिट जायेगा ।

जो आप अपने भीतर निर्मित करेंगे

और अपने को बनाएंगे

तो आप एक चट्टान पर,

एक लोहे की चट्टान पर

कुछ लिख रहे हैं,

जिसके कि निशान

फिर कभी मिटते नहीं है,

जो कि अमिट रूप से आपके साथ होगा ।

!! ओशो !!


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