मित्र कौन दुश्मन कौन

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मित्र तो वही है जो तुम्हारे दोष को प्रकट कर दे दुश्मन वही है जो तुम्हारे दोष को ढांक दे लेकिन अब तक तुम्हारी परिभाषा अलग है, तुम मित्र उसे कहते हो जो तुम्हारे दोष ढांके दुश्मन उसे कहते हो जो तुम्हारे दोष उभारे[/box]

 

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Osho vichar on friend

तुमने पूछा है कि वास्तविक प्रामाणिक मैत्री क्या है? तुम मैत्री का स्वाद चख सको इसके लिए तुम्हारे अंदर महान रूपांतरण की आवश्यकता है। जैसे अभी तुम हो, उसमें तो मैत्री एक दूर का सितारा है। तुम दूर के सितारे को देख तो सकते हो, तुम इस संबंध में बौद्धिक समझ भी रख सकते हो, पर यह समझ केवल बौद्धिक समझ ही बनी रहेगी, यह कभी अस्तित्वगत स्वाद नहीं बन सकता।

जब तक तुम मैत्री का अस्तित्वगत स्वाद न लो, तब तक यह बड़ा मुश्किल होगा, लगभग असंभव कि तुम मित्रता और मैत्री में अंतर कर सको। तुम ऐसा समझ सकते हो कि मैत्री प्रेम का सबसे पवित्र रूप है। यह इतना पवित्र है कि तुम इसे फूल भी नहीं कह सकते, तुम ऐसा कह सकते हो कि यह एक ऐसी सुगंध है जिसको केवल अनुभव किया जा सकता है, और महसूस किया जा सकता है। पर इसे तुम पकड़ नहीं सकते। यह मौजूद है, तुम्हारे नासापुट इसे महसूस कर सकते हैं, तुम चारों ओर इससे घिरे हुए हो, तुम इसकी तंरगें महसूस कर सकते हो पर इसको पकड़े रखे रहने का कोई मार्ग नहीं है; इसका अनुभव इतना बड़ा और व्यापक है, जिसके मुकाबले तुम्हारे हाथ इतने छोटे पड़ जाते हैं।

मैंने तुमसे कहा कि तुम्हारा प्रश्न बड़ा जटिल है–ऐसा तुम्हारे प्रश्न के कारण नहीं, पर तुम्हारे कारण कहा था। अभी तुम ऐसे बिंदु पर नहीं हो जहां मैत्री एक अनुभव बन सके। स्वाभाविक और प्रामाणिक बनो, तब तुम प्रेम की सबसे विशुद्ध गुणवत्ता को जान सकते हो: प्रेम की एक सुगंध जो हमेशा चारों ओर से घेरे हो। और इस विशुद्ध प्रेम की गुणवत्ता मैत्री है। मित्रता किसी व्यक्ति से संबंधित होती है, कोई व्यक्ति तुम्हारा मित्र होता है।

एक बार किसी व्यक्ति ने गौतम बुद्ध से पूछा कि क्या बुद्धपुरुष के भी मित्र होते हैं? उन्होंने जवाब दिया: नहीं। प्रश्नकर्ता अचंभित रह गया, क्योंकि वह सोच रहा था कि जो व्यक्ति स्वयं बुद्ध हो चुका–उसके लिए सारा संसार मित्र होना चाहिए। चाहे तुम्हें यह जानकर धक्का लगा हो या न लगा हो, पर गौतम बुद्ध बिलकुल सही कह रहे हैं। जब वे कह रहे हैं कि बुद्धपुरुष के मित्र नहीं होते, तब वे कह रहे हैं कि उनका कोई मित्र नहीं होता, क्योंकि उनका कोई शत्रु नहीं होता। ये दोनों चीजें एक साथ आती हैं। हां, वे मैत्री रख सकते हैं, पर मित्रता नहीं।

मैत्री ऐसा प्रेम है जो किसी अन्य से संबंधित या किसी अन्य को संबोधित नहीं है। न ही यह किसी तरह का लिखित या अलिखित समझौता है, न ही किसी व्यक्ति का व्यक्ति विशेष के प्रति प्रेम है। यह व्यक्ति का समस्त अस्तित्व के प्रति प्रेम है, जिसमें मनुष्य केवल छोटा सा भाग है, क्योंकि इसमें पेड़ भी सम्मिलित हैं, इसमें पशु भी सम्मिलित हैं,नदियां भी सम्मिलित हैं, पहाड़ भी सम्मिलित हैं और तारे भी सम्मिलित हैं–मैत्री में प्रत्येक चीज सम्मिलित है।
मैत्री तुम्हारे स्वयं के सच्चे और प्रामाणिक होने का तरीका है। तुम्हारे अंदर से मैत्री की किरणें निकलने लगती हैं। यह अपने से होता है, इसको लाने के लिए तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता। जो कोई भी तुम्हारे संपर्क में आता है, वह इस मैत्री को महसूस कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारा कोई शत्रु नहीं होगा, पर जहां तक तुम्हारा संबंध है, तुम किसी के भी शत्रु नहीं होते, क्योंकि अब तुम किसी के मित्र भी नहीं हो। तुम्हारा शिखर, तुम्हारा जागरण, तुम्हारा आनंद, तुम्हारा मौन बहुतों को परेशान करेगा और बहुतों में जलन पैदा करेगा, यह सब होगा, और यह सब बिना तुम्हें समझे होगा।

वास्तव में बुद्धपुरुष के शत्रु ज्यादा होते हैं बजाय अज्ञानी के। साधारण जन के कुछ ही शत्रु होते हैं और कुछ ही मित्र। पर इसके विपरीत लगभग सारा विश्व ही बुद्धपुरुष के विरोध में दिखाई देता है, क्योंकि अंधे लोग किसी आंख वाले को क्षमा नहीं कर सकते। और अज्ञानी उसे माफ नहीं कर सकते जो ज्ञानी हैं। वे उस आदमी से प्रेम नहीं कर सकते जो आत्यंतिक कृतार्थता को उपलब्ध हो गया है क्योंकि उनके अहं को चोट लगती है।
जारी—- (सौजन्‍य से: ओशो इंटरनेश्‍नल न्‍यूज लेटर)[/box]

अहंकार की मृत्यु

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अहंकार की मृत्यु परमात्मा का अनुभव है धन्यभागी हैं वे जिनका अहंकार मर जाता है, और जो अपने अहंकार को मर जाने देते है उससे बड़ा कोई सौभाग्य नहीं है।[/box]

जिंदगी दोगे जिंदगी मिलेगी

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वही मिलेगा जो दोगे, जिंदगी दोगे, जिंदगी मिलेगी जिंदगी लोगे, जिंदगी छिन जाएगी जगत प्रतिध्वनि करता है। गीत गाओ, चारों तरफ से गीत तुम पर बरस जाएंगे। गालियां दो, चारों तरफ से गालियां तुम पर बरस जाएंगी। जो चाहो लो मगर शर्त यही है की वही दोगे तो मिलेगा जगत प्रतिदान है, तुम दान करो, जगत प्रतिदान है हज़ार गुना होकर लौट आता है सब।[/box]

गुरु कौन

guru kaun osho vachan

guru kaun osho vachan

 

शास्त्रों मे कहा है – गुरु के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए, मैं तुमसे कहता हूँ जिसके प्रति श्रद्धा हो, वह गुरु। गुरु के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए, यह कोई चाहने की बात है? यह कोई चाहत से हो सकती है? जिसके प्रति श्रद्धा पैदा हो जाए, वह गुरु। जिसके प्रति तुम्हारे बावजूद श्रद्धा हो जाए, वह गुरु।

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ओशो के विचार

osho ke anmol vachan

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osho ke anmol vachan

 

यहां कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है। हर कोई अपनी तकदीर और अपनी हक़ीक़त बनाने मे लगा है।[/box]

ध्यान का अर्थ

osho quotes in hindi

osho quotes in hindi

 

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प्रवेश के पूर्व:

तुमने पूछा है: मैं कैसे अपने अचेतन, अपने अंधरे को प्रकाश से भर दूं?

एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। बहुत छोटा सा काम।

चौबीस घंटे तुम दूसरे को देखने में लगे हो—दिन में भी और रात में भी। कम से कम कुछ समय दूसरे को भूलने में लगो। जिस दिन तुम दूसरे को बिलकुल भूल जाओगे, बुद्धि की उपयोगिता नष्‍ट हो जाएगी।

इसे ज्ञानियों ने ध्‍यान कहा है। ध्‍यान का अर्थ है: एक ऐसी अवस्‍था,जब जानने को कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ जानने वाला ही बचा। उससे छुटकारे का कोई उपाय नहीं है। लाख भागो पहाड़ों पर और रेगिस्‍तानों में, चाँद—तारों पर,लेकिन तुम्‍हारा जानने वाला तुम्‍हारे साथ होगा। चूंकि वह तुम हो, वह तुम्‍हारी आस्‍तित्‍व है। रोज घडी भर, कभी भी सुबह या सांझ या दोपहर, इस अनूठे आयाम को देना शुरू कर दो। बस आँख बंद करे बैठ जाओ, …….

…….जब मैं कहता हूं कि घड़ी आधा घड़ी को आँख बंद करके बैठ जाओ….तो तुमसे मैं यह कहा रहा हूं कि घड़ी आधा घड़ी को दूसरों को भूल जाओ। चौबीस घंटे पड़े है। तेईस घंटे सारे संसार को दे दो, बाजार को दे दो, दुकान को दे दो, मकान को दे दो—जिसको देना हो,उसको दे दो। लेकिन क्‍या तुम इतने भी अधिकारी नहीं हो कि एक घंटा अपने लिए बचा लो? शायद चौबीस घंटा बचाना बहुत मुश्‍किल है एक घंटा बचाना आसान हो सकता है। और फिर मैं तुम से यह भी नहीं कहता कि इस घंटे को बचाने के लिए तुम हिमालय की किसी गुफा में बैठो। तुम्‍हारा घर पर्याप्‍त है, और सबसे ज्‍यादा आसान जगह है। क्‍योंकि वहां जो भी है, उससे तुम्‍हें परिचय है। और एक घंटे के लिए उस सबको भूल जाना कठिन नहीं है।

आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, जल्‍दी ही वह घड़ी आ जाती है कि तुम चुपचाप बैठे ही रहते हो। मूर्तियां आएंगी, मत रस लेना उनमें—न पक्ष में और न विपक्ष में। आने देना और जाने देना। रास्‍ता है, मन की राह है। चलती है। तुम राह के किनारे बैठे देखते रहना। और तुम चकित होओगे, इस जीवन के सबसे बड़े रहस्‍य के चकित होओेगे, कि अगर तुम साक्षी भाव से—सिर्फ साक्षी भाव से, जैसे तुम कुछ लेना—देना नहीं कौन जा रहा है, कौन आ रहा है, तुम गुमसुम चुपचाप सड़क के किनारे बैठे ही रहना। जल्‍दी ही वह घड़ी आ जाएगी कि यह रास्‍ते की भीड़ कम होने लगेगी। क्‍योंकि इस भीड़ के रास्‍ते पर होने का कारण है। तुमने इसे निमंत्रण दिया है। तुमने अब तक इसका स्‍वागत है। यह बिना बुलाई नहीं है। और जब यह देखेगी कि तुम इतनी उपेक्षा से भर गए हो कि तुम लौट कर भी नहीं देखते—कौन आया, कौन गया, अच्‍छा था या बुरा, सुंदर था या कि असुंदर, अपना था कि पराया—यह भीड़ धीरे—धीरे विदा होने लगेगी।

ध्‍यान की प्रक्रिया बड़ी सरल है। थोडी सी धैर्य की क्षमता चाहिए। और खोने को क्‍या है? अगर कुछ न भी मिला तो कम से कम घंटा भर आराम तो कर ही लोगे। लेकिन मैं जानता हूं आपने अनुभव से और उन हजारों लोगों के अनुभव से, जिनको मैंने इस प्रक्रिया से गुजारा है, एक दिन वह घड़ी आ जाती है। वह महाघड़ी आ जाती है कि मन का रास्‍ता खाली हो जाता है। धूल भी नहीं उड़ती जानने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता। और जब जानने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता, तब सिर्फ जानने वाला शेष रह जाता है। और उस जानने वाले को अब कोई उपाय नहीं किसी ओर को जानने का। सिवाय अपने को जानने के। जानना उसका स्‍वभाव है। अगर तुम कुछ खिलौने उसे हाथ में दे देते हो, कोई झुनझुना हाथ में दे देते हो, वह उसी को जानता रहता है। अब आज कुछ भी नहीं है। आज वह अपने को ही जानता है। और एकबार भी किसी ने अपने स्‍वाद ले लिया तो उसने अमृत को स्‍वाद ले लिया। फिर न कोई अँधेरा है, फिर न कोई अचेतना है।

और वह एक घड़ी धीरे—धीरे तुम्‍हारे चौबीस घड़ियों पर फैल जाएगी। फिर भी तुम बाजार में, रहोगे फिर भी तुम घर में। वही होगी पत्‍नी, वही होगा बच्‍चे। लेकिन तुम वही नहीं होओगे। तुम्‍हारे जीवन में एक क्रांति घटित हो जाएगी। तुम्‍हारे देखने के सारे परिप्रक्ष्य, तुम्‍हारी आंखें बदल जाएंगी। एक शांति—और ऐसी शांति, जिसकी कोई गहाराई कभी नाप नहीं सका। और एक प्रकाश,और एक ऐसा प्रकाश, जिसमें ने तो कोई तेल है, न कोई बाती है—बिन बाती बन तेल। इसलिए उसके चुकने को कोई उपाय नहीं है।

इस अनुभूति के बिना सारा जीवन व्‍यर्थ है। और इस अनुभूति को पा लेना उस परम ऐश्‍वर्य को पा लेना है, जो कभी चुकता ही नहीं है।

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