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Rajneesh Osho

संसार की चाबियां

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ओशो के कुछ महत्वपूर्ण विचार – Osho Quotes on Life in Hindi

ओशो एक ऐसे दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने जीवन के लगभग हर पहलू पर अपने विचार रखें हैं, लेकिन उन्होने अपने हर विचार में ध्यान पर मुख्य रूप से ज़ोर दिया है, ओशो ने अपने प्रवचनों में हास्य और व्यंग्य द्वारा आम लोगों तक जीवन जीने की महत्वपूर्ण बातें बताई और उनके हास्य में मुल्ला नसरुद्दीन मुख्य पात्र होता है।

*संसार की चाबियां*

मुल्ला नसरुद्दीन एक
धनपति के घर नौकरी करता था।
एक दिन उसने कहा, “सेठ जी,
मैं आपके यहां से नौकरी छोड़ देना चाहता हूं।
क्योंकि यहां मुझे काम करते हुए कई साल हो गए,
पर अभी तक मुझ पर आप को भरोसा नहीं है।’
सेठ ने कहा, “अरे पागल! कैसी बात करता है!
नसरुद्दीन होश में आ! तिजोरी की सभी चाबियां
तो तुझे सौंप रखी हैं। और क्या चाहता है?
और कैसा भरोसा?’

नसरुद्दीन ने कहा, “बुरा मत मानना, हुजूर!
लेकिन उसमें से एक भी चाबी
तिजोरी में लगती कहां है!’

जिस संसार में तुम अपने को मालिक समझ रहे हो,
चाबियों का गुच्छा लटकाए फिरते हो,
बजाते फिरते हो,
कभी उसमें से चाबी कोई एकाध लगी,
कोई ताला खुला?
कि बस चाबियों का गुच्छा लटकाए हो।
और उसकी आवाज का ही मजा ले रहे हो।
कई स्त्रियां लेती हैं, बड़ा गुच्छा लटकाए रहती हैं।
इतने ताले भी मुझे उनके घर में नहीं दिखाई पड़ते जितनी चाबियाँ लटकाई हैं। मगर आवाज, खनक सुख देती है।

जरा गौर से देखो, तुम्हारी सब चाबियाँ व्यर्थ गई हैं।
क्रोध करके देखा, लोभ करके देखा,
मोह करके देखा, काम में डूबे,
धन कमाया, पद पाया, शास्त्र पढ़े,
पूजा की, प्रार्थना की–कोई चाबी लगती है?

महावीर कहते हैं,
संसार की कोई चाबी लगती नहीं।
और जब तुम सब चाबियाँ फेंक देते हो,
उसी क्षण द्वार खुल जाते हैं।
संसार से सब तरह से वीतराग हो जाने में ही चाबी है।

ओशो : जिनसूत्र

 

अगर आपके पास भी ओशो से जुड़े कोई विचार, कहानी या प्रवचन हैं तो नीचे दिये कॉमेंट बॉक्स के द्वारा हमें भेजें हम उसे अपनी इस वेबसाइट पर प्रकाशित कर देंगे

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Rajneesh Osho

हर घर अपना घर, पर बंजारा मन। गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

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हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

एक से हजार हुआ, यह सारा मन।
गिर कर न सिमटे फिर, यह पारा मन।
खुद को ही जीत-जीत, है हारा मन।
कितना बेबाक, कितना बेचारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

शूल-सा चुभे, यह फूल-सा प्यारा मन।
अंधा, पर सबकी आंखों का तारा मन।
खुद के न पांव, पर सबका सहारा मन।
हर गले का हार, यह गले की कारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

हर कहीं दिल दे बैठे, यह क्वांरा मन।
कोठे का किवारा, मंदिर का भी द्वारा मन।
हर बर्तन की हो ले, ऐसी जलधारा मन।
कितना भोला है और कितना हुशियारा मन!
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

नये-नये रूप धरे, फिर वही दुबारा मन।
बेनकाब कैसे हो, यह सजा-संवारा मन।
छुप-छुप कर बदले ले, यह इनकारा मन।
जाने कब डस ले, यह फन मारा मन।
श्वान-सा हो संग, फिर-फिर दुतकारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

पीकर न प्यास बुझे, सागर-सा खारा मन।
कस्तूरी मृग-सा फिरे, वन-वन यह मारा मन।
होश से मिले तो हरदम करे किनारा मन।
देखते ही छार हो, यह अनंग-अंगारा मन।
शव से शिव-रूप हुआ, यह मन से मारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

एक अबूझ पहेली, एक जादुई पिटारा मन।
अभी लहर, अभी भंवर, अभी किनारा मन।
हमसे ही दगा करे, बेवफा हमारा मन।
दुश्मन से भी जालिम, दोस्त से भी प्यारा मन।
हर घर अपना घर, पर बंजारा मन।
गली-गली भटके, यह आवारा मन।।

आपुई गई हिराय (प्रश्नत्तोर) – ओशो

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Philosophical Quotes

आस्तिक और नास्तिक में श्रेष्ठ कौन है?

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प्रश्न:- आस्तिक और नास्तिक में श्रेष्ठ कौन है..?

उत्तर:- मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूँ, वे ही असली पात्र हैं। आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं। आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं। अब आस्तिको में सच्चा आदमी कहाँ मिलता है?

अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे। अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है।

आस्तिक के आस्तिक होने में ही झूठ है। उसे पता तो है नहीं ईश्वर का कुछ, और मान बैठा है। न आत्मा का कुछ पता है, और विश्वास कर लिया है। यह तो झूठ की यात्रा शुरू हो गयी। और बड़े झूठ! एक आदमी छोटे-मोटे झूठ बोलता है, उसको तुम क्षमा कर देते हो। क्षमा करना चाहिए। लेकिन ये बड़े-बड़े झूठ क्षम्य भी नहीं हैं। ईश्वर का पता है? अनुभव हुआ है? दीदार हुआ है? दर्शन हुआ है? साक्षात्कार हुआ है? कुछ नहीं हुआ। माँ-बाप से सुना है। पंडित-पुरोहित से सुना है।

आसपास की हवा में गूँज है कि ईश्वर है, मान लिया है। भय के कारण, लोभ के कारण, संस्कार के कारण। यह मान्यता दो कौड़ी की है। यह असली आस्तिकता थोड़े ही है। यह नकली आस्तिकता है। असली आस्तिकता असली नास्तिकता से शुरू होती है।

नास्तिक कौन है? नास्तिक वह है जो कहता है, मुझे अभी पता नहीं, तो कैसे मानूँ? जब तक पता नहीं, तब तक कैसे मानूँ? जानूँगा तो मानूँगा। और जब तक नहीं जानूँगा, नहीं मानूँगा।

मैं ऐसे ही नास्तिकों की तलाश में हूँ। जो कहता है जब तक नहीं जानूँगा तब तक नहीं मानूँगा, मैं उसी के लिए हूँ। क्योंकि मैं जनाने को तैयार हूँ। आओ, मैं तुम्हें ले चलूँ उस तरफ! मैंने देखा है, तुम्हें दिखा दूँ! आस्तिक को तो फिकर ही नहीं है देखने की। वह तो कहता है, हम तो मानते ही हैं, झंझट में क्या पड़ना!

हम तो पहले ही से मानते हैं। यह उसकी तरकीब है परमात्मा से बचने की। उसकी परमात्मा में उत्सुकता नहीं है। इतनी भी उत्सुकता नहीं है कि इंकार करे। वह परमात्मा को दो कौड़ी की बात मानता है, वह कहता है, क्या जरूरत है फिकर करने की? असल में परमात्मा की झंझट में वह पड़ना नहीं चाहता, इसलिए कहता है कि होगा, जरूर होगा, होना ही चाहिए; जब सब लोग कहते हैं तो जरूर ही होगा। इसको बातचीत के योग्य भी नहीं मानता है। इस पर समय नहीं गँवाना चाहता है। वह कहता है, यह एक औपचारिक बात है, कभी हो आए चर्च, कभी हो आए मंदिर, कभी रामलीला देख ली–सब ठीक है। अच्छा है, सामाजिक व्यवहार है।

सबके साथ रहना है तो सबके जैसा होकर रहने में सुविधा है। सब मानते हैं, हम भी मानते हैं। अब भीड़ के साथ झंझट कौन करे? औ झंझट करने-योग्य यह बात भी कहाँ है? इसमें इतना बल ही कहाँ है कि इसमें हम समय खराब करें?
तुम देखते हो, लोग राजनीति का ज्यादा विवाद करते हैं, बजाय धर्म के। बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सी पार्टी ठीक! बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सा सिद्धांत ठीक! धर्म का तो विवाद ही खो गया है! धर्म का विवाद ही कौन करता है? अगर तुम एकदम बैठे हो कहीं होटल में, क्लबघर में और एकदम उठा दो कि ईश्वर है या नहीं; सब कहेंगे कि भई होगा, बैठो, शांत रहो, जरूर होगा, मगर यहाँ झंझट तो खड़ी न करो। कौन इस बकवास में पड़ना चाहता है?

नास्तिक अभी भी उत्सुक है। नास्तिक का मतलब यह है–वह यह कहता है कि परमात्मा अभी भी विचारणीय प्रश्न है; खोजने-योग्य है; जिज्ञासा-योग्य है; अभियान-योग्य है। जाऊँगा, खोजूँगा। नास्तिक यह कह रहा है कि मैं दावँ पर लगाने को तैयार हूँ। समय, तो समय लगाऊँगा।

मेरे अपने देखे जगत में जो परम आस्तिक हुए हैं, उनकी यात्रा परम नास्तिकता से ही होती है, क्योंकि सचाई से ही सचाई की खोज शुरू होती है। कम-से-कम इतनी सचाई तो बरतो कि जो नहीं जानते हो उसको कहो मत कि मानता हूँ।

नास्तिक की भूल कहाँ होती है? नास्तिक की भूल इस बात में नहीं है कि वह ईश्वर को नहीं मानता, नास्तिक की भूल इस बात में है कि ईश्वर के न होने को मानने लगता है । तब भूल हो जाती है। फर्क समझ लेना।

अगर आस्तिक ईमानदार है तो वह इतना ही कहेगा कि मुझे पता नहीं, मैं कैसे कहूँ कि है, मैं कैसे कहूँ कि नहीं है? अपना अज्ञान घोषणा करेगा; लेकिन ईश्वर के संबंध में हाँ या नहीं का कोई निर्णीत जवाब नहीं देगा। यह असली नास्तिक है। जो नास्तिक कहता है कि मुझे पता है कि ईश्वर नहीं है, यह झूठा नास्तिक है। यह आस्तिक जैसा हि झूठा है। आस्तिक ने एक तरह की झूठ पकड़ी है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर है, इसने दूसरी तरह की झूठ पकड़ी है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर नहीं है। दोनों झूठ हैं।

असली नास्तिक कहता है, मुझे पता नहीं, मैं अज्ञानी हूँ, मैंने अभी नहीं जाना है, इसलिए मैं कोई भी निर्णय नहीं दे सकता, मैं कोई निष्कर्ष घोषित नहीं कर सकता।
मगर यही तो खोजी की अवस्था है। यही तो जिज्ञासा का आविर्भाव है। यहीं से तो जीवन की यात्रा शुरू होती है।

तुम कहते हो, ‘आत्मा-परमात्मा, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, मंत्र-तंत्र , चमत्कार- भाग्यादि में मेरा कतई विश्वास नहीं है। मैं निपट नास्तिक हूँ।’ तो तुम ठीक आदमी के पास आ गए। अब तुम्हें कहीं जाने की कोई जरूरत न रही। मैं भी महा नास्तिक हूँ। दोस्ती बन सकती है। मैं तुम्हारी ‘नहीं’ को ‘हाँ’ में बदल दूँगा। मगर यह बदलाहट किसी विश्वास के आरोपण से नहीं–यह बदलाहट किसी अनुभव से। और वह अनुभव शुरू हो गया है। किरण उतरने लगी है। तुम कहते हो, ‘आपके प्रवचनों में अनोखा आकर्षण है तथा मन को आनंद से अभिभूत प्रेरणाएँ मिलती हैं।’ शुरू हो गयी बात, क्योंकि परमात्मा आनंद का ही दूसरा नाम है। परमात्मा कुछ और नहीं है, आनंद की परम दशा है, आनंद की चरम दशा है। परमात्मा सिर्फ एक नाम है आनंद के चरम उत्कर्ष का। शुरू हो गयी बात।

तुम मुझे सुनने लगे, डोलने लगे मेरे साथ; तुम मुझे सुनने लगे, मस्त होने लगे; तुम मेरी सुराही से पीने लगे; शुरू हो गयी बात। तुम रंगने लगे मेरे रंग में। अब देर की कोई जरूरत नहीं है। तुम संन्यासी बनो। बनना ही होगा! अब बचने का कोई उपाय भी नहीं है। अब भागने की कोई सुविधा भी नहीं है।

मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है। आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं। नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं। कहने-भर का भेद है। आखिरी अवस्था में ‘हाँ’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं।

🎷🎷🎷🎷🎷🎷ओशो🎷🎷🎷🎷🎷🎷

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Philosophical Quotes

💖जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य है जो स्वयं ही जाने जाते है💖

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jindagi me kuchh jeevant satya hai jo svayam hi jane jate hai

jindagi me kuchh jeevant satya hai jo svayam hi jane jate hai

 

एक मुसलमान फकीर हुआ, नसरुद्दीन वह एक नदी पार कर रहा था एक नाव में बैठ कर। रास्ते में मल्लाह और नसरुद्दीन कि बातचीत भी होती रही नसरुद्दीन बड़ा ज्ञानी आदमी समझा जाता था।

ज्ञानियों को हमेशा कोशिश रहती है किसी को अज्ञानी सिद्ध करने का मौका मिल जाए तो वह छोड़ नहीं सकते। तो उसने मल्लाह से पूछा कि भाषा जानते हो? मल्लाह ने कहा :भाषा… पढना-लिखना मुझे पता नहीं, जीतना बोलता हूं उतना ही जानता हूँ।

नसरुद्दीन ने कहा :तेरा चार आना जीवन बेकार चला गया। क्योंकि जो पढ़ना नहीं जानते क्या उसे ज्ञान मिल सकता है?
कहीं ज्ञान मिला है। मल्लाह चुपचाप हंसने लगा।

थोड़ी चले और नसरुद्दीन ने पूछा तुझे गणित आता है? मल्लाह ने कहा मुझे गणित नहीं आता है। ऐसे दो और दो चार जोड़ लेता हूँ। नसरुद्दीन ने कहा तेरा चार आना जीवन और बेकार चला गया। जीसे जोड़ नहीं आता वह जिंदगी में क्या जोड़ सकेगा। तेरा आठ आना जीवन बेकार गया।

फिर जोर का तुफान और आंधी आई और नाव उलटने करीब हो गई। उस मल्लाह ने पूछा :आपको तैरने आता है?
नसरुद्दीन ने कहा :मुझे तैरने नहीं आता।
मल्लाह ने कहा :आप की सोलह आने जिंदगी बेकार जाती है।

मै तो चला। मुझे गणित नहीं आता और न मुझे भाषा आती है, लेकिन मुझे तैरना आता है। मै तो चला।

जिंदगी में कुछ जीवंत सत्य है जो स्वंय हीं जाने जाते है, जो शास्त्र से नही जाने जा सकते। आत्मा का सत्य या परमात्मा का सत्य स्वंय ही जाना जा सकता है और कोई जानने का उपाय नहीं है।

🌼🌼🌼🌼🌼अंतरयात्रा🌼🌼🌼🌼🌼

🌺Rajneesh Osho🌺

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