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Suvichar

हाथ की शोभा दान से है। सिर की शोभा

[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]हाथ की शोभा दान से है। सिर की शोभा अपने से बड़ों को प्रणाम करने से है। मुख की शोभा सच बोलने से है। दोनों भुजाओं की शोभा युद्ध में वीरता दिखाने से है। हृदय की शोभा स्वच्छता से है। कान की शोभा शास्त्र के सुनने से है। यही ठाट बाट न होने पर भी सज्जनों के भूषण हैं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]प्रेम करने वाला पड़ोसी दूर रहने वाले भाई से कहीं उत्तम है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]समुद्रों में वृष्टि निरर्थक है, तृप्तों को भोजन देना वृथा है, धनाढ्यों को धन देना तथा दिन के समय दिए का जला लेना निरर्थक है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जो विद्या पुस्तक में रखी हो, मस्तिष्क में संचित हो और जो धन दूसरे के हाथ में चला गया हो, आवश्यकता पड़ने पर न वह विद्या ही काम आ सकती है और न वह धन ही।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]ईश्वर न तो काष्ठ में विद्यमान रहता है, न पाषाण में और न ही मिट्टी की मूर्ति में। वह तो भावों में निवास करता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]फल मनुष्य के कर्म के अधीन है, बुद्धि कर्म के अनुसार आगे बढ़ने वाली है, फिर भी विद्वान् और महात्मा लोग अच्छी तरह से विचार कर ही कोई कर्म करते हैं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]बुद्धिमान को चाहिए कि वह धन का नाश, मन का संताप, घर के दोष, किसी के द्वारा ठगा जाना और अमानित होना-इन बातों को किसी के समक्ष न कहे।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जिस गुण का दूसरे लोग वर्णन करते हैं उससे निर्गुण भी गुणवान होता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]स्वयं अपने गुणों का बखान करने से इंद्र भी छोटा हो जाता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]गुणों से ही मनुष्य महान् होता है, ऊंचे आसन पर बैठने से नहीं। महल के कितने भी ऊंचे शिखर पर बैठने से भी कौआ गरुड़ नहीं हो जाता।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]गुण की पूजा सर्वत्र होती है, बड़ी संपत्ति की नहीं, जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमा वैसा वंदनीय नहीं है जैसा निर्दोष द्वितीय का क्षीण चंद्रमा।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]भली स्त्री से घर की रक्षा होती है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]पानी में तेल, दुर्जन में गुप्त बात, सत्पात्र में दान और विद्वान् व्यक्ति में शास्त्र का उपदेश थोड़ा भी हो, तो स्वयं फैल जाता।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]तब तक ही भय से डरना चाहिए जब तक कि वह पास नहीं आ जाता। परंतु भय को अपने निकट देखकर प्रहार करके उसे नष्ट करना ही ठीक है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]ब्रह्मा ज्ञानी को स्वर्ग तृण है, शूर को जीवन तृण है, जिसने इंद्रियों को वश में किया उसको स्त्री तृण-तुल्य जान पड़ती है, निस्पृह को जगत् तृण है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जिस देश में मान नहीं, जीविका नहीं, बंधु नहीं और विद्या का लाभ भी नहीं है, वहां नहीं रहना चाहिए।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]दूसरों की सुन लो, लेकिन अपना फैसला गुप्त रखो।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]दूध का आश्रय लेने वाला पानी दूध हो जाता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]धीरज होने से दरिद्रता भी शोभा देती है, धुले हुए होने से जीर्ण वस्त्र भी अच्छे लगते हैं, घटिया भोजन भी गर्म होने से सुस्वादु लगता है और सुंदर स्वाभाव के कारण कुरूपता भी शोभा देती है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]तीर्थों के सेवन का फल समय आने पर मिलता है, किंतु सज्जनों की संगति का फल तुरंत मिलता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]यदि तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे गुणों की प्रशंसा करें तो दूसरे के गुणों को मान्यता दो।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]मेहनत वह चाबी है जो किस्मत का दरवाज़ा खोल देती है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जो प्रकृति से ही महान् हैं उनके स्वाभाविक तेज को किसी (शारीरिक) ओज-प्रकाश की अपेक्षा नहीं रहती।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]प्रजा के सुख में ही राजा का सुख और प्रजाओं के हित में ही राजा को अपना हित समझना चाहिए। आत्मप्रियता में राजा का अपना हित नहीं है, प्रजाओं की प्रियता में ही राजा का हित है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]कुल के कारण कोई बड़ा नहीं होता, विद्या ही उसे पूजनीय बनाती है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जहां मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहां धान्य भविष्य के लिए संग्रहीत किया हुआ है, जहां स्त्री-पुरुष में कलह नहीं होती- वहां मानो लक्ष्मी स्वयमेव आई हुई है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]मर्यादा का उल्लंघन कभी मत करो।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]शांति के समान दूसरा तप नहीं है, न संतोष से परे सुख है, तृष्णा से बढ़कर दूसरी व्याधि नहीं है, न दया से अधिक धर्म है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]सज्जनों का सत्संग ही स्वर्ग में निवास के समान है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]समृद्धि व्यक्तित्व की देन है, भाग्य की नहीं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]अपमानपूर्वक जीने से अच्छा है प्राण त्याग देना। प्राण त्यागने में कुछ समय का दु:ख होता है, लेकिन अपमानपूर्वक जीने में तो प्रतिदिन का दु:ख सहना होता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख कहां? सुख चाहने वाले को विद्या और विद्यार्थी को सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]शांति जैसा तप नहीं है, संतोष से बढ़कर सुख नहीं है, तृष्णा से बढ़कर रोग नहीं है और दया से बढ़कर धर्मा नहीं है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]व्यक्ति अकेले पैदा होता है और अकेले मर जाता है;और वो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद ही भुगतता है; और वह अकेले ही नर्क या स्वर्ग जाता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]अगर सांप जहरीला ना भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है। एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पता है। शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]कोई व्यक्ति अपने कार्यों से महान होता है, अपने जन्म से नहीं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]किसी मूर्ख व्यक्ति के लिए किताबें उतनी ही उपयोगी हैं जितना कि एक अंधे व्यक्ति के लिए आईना।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]सर्प, नृप, शेर, डंक मारने वाले ततैया, छोटे बच्चे, दूसरों के कुत्तों, और एक मूर्ख: इन सातों को नींद से नहीं उठाना चाहिए।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]इस बात को व्यक्त मत होने दीजिये कि आपने क्या करने के लिए सोचा है, बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाये रखिये और इस काम को करने के लिए दृढ रहिये।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जैसे ही भय आपके करीब आये, उसपर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयम से तीन प्रश्न कीजिये – मैं ये क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं सफल होऊंगा। और जब गहरई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तभी आगे बढें।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]जब तक आपका शरीर स्वस्थ्य और नियंत्रण में है और मृत्यु दूर है, अपनी आत्मा को बचाने कि कोशिश कीजिये; जब मृत्यु सर पर आजायेगी तब आप क्या कर पाएंगे?[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]पहले पाच सालों में अपने बच्चे को बड़े प्यार से रखिये। अगले पांच साल उन्हें डांट-डपट के रखिये। जब वह सोलह साल का हो जाये तो उसके साथ एक मित्र की तरह व्यव्हार करिए। आपके व्यस्क बच्चे ही आपके सबसे अच्छे मित्र हैं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए; विवेकवान व्यक्ति हमेशा वर्तमान में जीते हैं।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है। ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो। यह कड़वा सच है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]वेश्याएं निर्धनों के साथ नहीं रहतीं, नागरिक दुर्बलों की संगती में नहीं रहते, और पक्षी उस पेड़ पर घोंसला नहीं बनाते जिसपे फल ना हों।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]अपमानित होके जीने से अच्छा मरना है। मृत्यु तो बस एक क्षण का दुःख देती है, लेकिन अपमान हर दिन जीवन में दुःख लाता है।[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है.[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथमित्रवत व्यवहार[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है.[/box]
[box type=”shadow” align=”” class=”” width=””]हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है। ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमे स्वार्थ ना हो. यह कड़वा सच है।[/box]