असली ज्ञानी अपने को बनाता है

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🌹दुनिया में और सब कलाएं बाहर हैं।
मूर्तिकार मूर्ति बनाता है, चित्रकार चित्र बनाता है,
गीतकार गीत बनाता है।
लेकिन बुद्ध कहते हैं,
असली ज्ञानी अपने को बनाता है।
मूर्ति को नहीं गढ़ता, अपने को गढ़ता है।
चित्र को नहीं रंगता, अपने को रंगता है।
गीत को नहीं सजाता, अपने को सजाता है।
अपने सौंदर्य को निखारता है।
बड़े से बड़ा स्रष्टा वही है,
जो अपने को सृजन दे देता है;
जो अपने को नया जन्म दे देता है।🌹

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पत्नी की देह परमात्मा की पहली परत

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तुम जब अपनी पत्नी में डूबते हो या अपने पति में डूबते हो, तब भी तुम परमात्मा का ही रस लेना चाह रहे हो।

सिर्फ तुमने ज़रा लंबा रास्ता चुना है देह, फिर देह के भीतर मन है, और मन के भीतर आत्मा है–और आत्मा के भीतर परमात्मा छिपा है। तुम पत्नी की देह में ही उलझ गए, तो ऐसा हुआ कि छीलने चले थे प्याज की गांठ को, बस पहली ही पर्त उघाड़ पाए।

पत्नी के मन तक पहुंचो–दूसरी पर्त उघड़ेगी। पत्नी की आत्मा तक पहुंचो–तीसरी पर्त उघड़ेगी। और पत्नी के भीतर भी तुम्हें परमात्मा के दर्शन होंगे, पत्नी मंदिर बन जाएगी।
और जब तक पत्नी मंदिर बन जाए और पति मंदिर न बन जाए, तब तक समझना कि प्रेम था ही नहीं, वासना ही थी।

🌎 अजहूं चेत गंवार 🌎

🌹Rajneesh Osho quotes🌹

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मन को निस्तरंग करो

Osho quotes in hindi

Osho quotes in hindi

 

काश! हम शांत हो सकें और भीतर गूंजते शब्दों और ध्वनियों को शून्य कर सकें, तो जीवन में जो सर्वाधिक आधारभूत है, उसके दर्शन हो सकते हैं। सत्य के दर्शन के लिए शांति के चक्षु चाहिए। उन चक्षुओं को पाये बिना जो सत्य को खोजता है, वह व्यर्थ ही खोजता है।
साधु रिझांई एक दिन प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा, ”प्रत्येक के भीतर, प्रत्येक के शरीर में वह मनुष्य छिपा है, जिसका कोई विशेषण नहीं है- न पद है, न नाम है। वह उपाधि शून्य मनुष्य ही शरीर की खिड़कियों में से बाहर आता है। जिन्होंने यह बात आज तक नहीं देखी है, वे देखें, देखें। मित्रों! देखो! देखो!” यह आवाहन सुनकर एक भिक्षु बाहर आया और बोला,”यह सत्य पुरुष कौन है? यह उपाधि शून्य सत्ता कौन है?” रिंझाई नीचे उतरा और भिक्षुओं की भीड़ को पार कर उस भिक्षु के पास पहुंचा। सब चकित थे कि उत्तर न देकर, वह यह क्या कर रहा है? उसने जाकर जोर-से उस भिक्षु को पकड़ कर कहा, ”फिर से बोलो।” भिक्षु घबड़ा गया और कुछ बोल नहीं सका। रिंझाई ने कहा,”भीतर देखो। वहां जो है- मौन और शांत- वही वह सत्य पुरुष है। वही हो तुम। उसे ही पहचानो। जो उसे पहचान लेता है, उसके लिए सत्य के समस्त द्वार खुल जाते हैं।”
पूर्णिमा की रात्रि में किसी झील को देखो। यदि झील निस्तरंग हो तो चंद्रमा का प्रतिबिंब बनता है। ऐसा ही मन है। उसमें तरंगें न हों, तो सत्य प्रतिफलित होता है। जिसके मन तरंगों से ढका है, वह अपने हाथों सत्य से स्वयं को दूर किये है। सत्य तो सदा निकट है, लेकिन अपनी अशांति के कारण हम सदा उसके निकट नहीं होते हैं।

🚶‍पथ के प्रदीप🚶

🙏🏻🌹 ओशो…. ✍🏻

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बाहर की शराब से ओंकार की शराब तक

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मैं शराबियों को भी संन्यास देता हूं।

और उनसे कहता हूं, बेफिक्री से लो!
पंडितों से तो तुम बेहतर हो। कम से कम विनम्र तो हो। कम से कम यह तो पूछते हो सिर झुकाकर कि क्या मैं भी पात्र हूं ???
क्या मेरी भी योग्यता है ???
क्या आप मुझे भी अंगीकार करेंगे ???

वह तो तिलकधारी पंडित है, वह सिर नहीं झुकाता, वह अकड़ कर खड़ा है। वह तो पात्र है ही! वह तो सुपात्र है! वह तो ब्राह्मण के घर में पैदा हुआ है! वह तो जन्म से ही ब्रह्म को जानता पैदा हुआ है!

शराबी उससे लाख दर्जा बेहतर है। कम से कम सिर तो झुकाए है, विनम्र तो है। अपने पात्रता का दावा तो नहीं कर रहो है। अहंकार तो नहीं है, अस्मिता तो नहीं है।
मैं उसे अंगीकार करता हूं। और यह मेरे अनुभव में आया है कि जैसे ही व्यक्ति ध्यान में उतरना शुरू करता है, शराब छूटनी शुरू हो जाती है।

मैं शराबबंदी का पक्षपाती नहीं हूं।

मैं तो चाहता हूं कि लोगों को असली शराब पिलायी जाए तो वे अपने-आप झूठी शराब पीना बंद कर देंगे। ऐसी शराब पिलायी जाए कि एक दफा पी ली तो पी ला, फिर जिसका नशा उतरता नहीं।

“तारी” शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। यह उस बेहोशी का नाम है जो परमात्मा को पीकर ही उपलब्ध होती है। तारी लग जाती है। तार जुड़ जाते हैं। फिर टूटते ही नहीं।

फिर एक “अनाहत संगीत” भीतर बजने लगता है।

यह शराब नहीं है जो अंगूरों से ढलती है, यह वह शराब है जो आत्मा में ढलती है। उस आत्मा में, जिस को पाने के लिए–

“नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो”

जिसे पाने के लिए प्रवचन किसी काम नहीं आते।

न मेधया न बहुन श्रुतेन।

और न बुद्धि काम आती, न शास्त्र काम आते।

यं एवैष वृणुते तेन लभ्यस

उन्हें मिलती है यह, जिन्हें परमात्मा वरण करता है।

तस्यैष आत्मा विवृणुते स्वाम।।

और यह आत्मा अपने रहस्य उनके सामने खोल देती है।

मगर परमात्मा किसको वरण करता है ??? पियक्कड़ों को, रिन्दों को।

तोड़ दो तोबा और जी भर कर पीओ।

दीपक बार नाम का

🌹Rajneesh Osho🌹

शून्य में लीन होते ही अनहद सुनाई देगा

osho anmol vachan

osho anmol vachan

जैसे धरती सागर में डूब जाए और प्रलय हो जाए,
ऐसे ही तुम जब अपने ही शून्य में लीन हो जाते हो तब अनहद सुनाई पड़ता है;
तब उसकी मुरली की तान सुनाई पड़ती है।
मंदिरों में तुमने कृष्ण की मूर्ति बना रखी है मुरली लिए हुए!

लाख जतन करो! पूजा पाठ कर्म क्रियाएँ करो!

कुछ भी न होगा। वह तो प्रतीक है।
वह तो केवल काव्य प्रतीक है, प्यारा प्रतीक है।
समझो-बूझो तो बड़ा प्यारा है।
और ऐसे ही सिर पटकते रहो,
आरती उतारते रहो कर्म कांड करते रहो,
वह तो बिल्कुल व्यर्थ है!

शून्य ही अनहद नाद सुनने का रास्ता है…….!!

🌹Osho🌹

चेतना का न जन्म होता है न मृत्यु वह सदा वर्तमान है

osho death

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ओशो का भौतिक शरीर तो 11 दिसंबर 1931 को पैदा हुआ और 19 जनवरी 1990 को इस दुनिया से विदा हुआ।

लेकिन केवल शरीर के विदा होने से विदा होने वाली वह चेतना नहीं है। इस ग्रह से जाने से पहले उन्होंने अपनी समाधि पर जो लिखवाया वह बहुत अर्थ पूर्ण है :
” ओशो जो न कभी पैदा हुए, न कभी मृत हुए “।

ओशो किसी व्यक्ति का नाम नहीं है, वरन वह एक चेतना है। चेतना का न जन्म होता है न मृत्यु। वह सदा वर्तमान है।

ओशो ने हिदायत दी है कि मेरा उल्लेख भूतकाल में मत करना। ओशो के विषय में अक्सर पुछा जाता है कि ओशो का दर्शन क्या है। स्वभावतया जिन्होंने 650 किताबे बोली है उनका कोई तो सिद्धांत, कोई तो ‘ वाद ‘ होगा। वे क्या कहना चाहते है?

ओशो के बारे में सबसे अनूठी बात यह है कि उन्हें किसी भी कोटि में बांधा नहीं जा सकता क्योकि विश्व में जितने भी दर्शन है, जितने भी इज्म्स है उनकी उन्होंने व्याख्या की है। उनका अपना कोई दर्शन नहीं है, न कोई सिद्धांत है। उनकी चेतना एक शून्य है, एक खाली दर्पण है। चूंकि वह दर्पण है इसलिए किसी को भी प्रतिबिंबित कर सकता है।

दर्पण का अपना चुनाव कहा होता है? जो सामने आया, दिखा दिया। कोई नहीं आया तो खाली बेठे है।

ओशो कहते है, मैं धर्म नहीं, धार्मिकता सिखाता हूं। धार्मिकता का कोई पंथ या कोई शास्त्र नहीं हो सकता।
यह वह गुणवत्ता है जो हर वस्तु में जन्मजात होती है।

जैसे फूल में सुगंध, अग्नि में उष्णता या पानी में शीतलता, वैसे धार्मिकता मनुष्य का आतंरिक स्वभाव है।

में तो यहां मनुष्य को बदलने का नया विज्ञान दे रहा हूं कि वह स्वयं से प्रेम करना सिखें। स्वयं से इतना प्रेम करो की कोई भी उपद्रवी तुम्हे किसी तरह की आत्महत्या के लिए राज़ी न कर पाये।

सत्य यह है कि मनुष्य के भीतर एक विराट आकाश छिपा है। जो अपने भीतर उतर जाए वह जगत के रहस्यों के द्वार पर खड़ा हो जाता है। उसके लिए मंदिर के द्वार खुल जाते है।

जो अपने भीतर की सीढियां उतरने लगता है वह जीवन के मंदिर की सीढ़िया उतरने लगता है। जो अपने भीतर जितना गहरा जाता है उतना ही परमात्मा का अपूर्व अद्वितीय रूप, सौंदर्य, सुगंध संगीत सब बरस उठता है।

ओशो के निर्वाण को 26 साल ही हुए है लेकिन उनकी गूंज हर ओर है–
पंछी लौट- लौट आते है,
तेरे बरगद में कुछ तो होगा।
सबके सब बौने लगते है,
तेरे कद में कुछ तो होगा।

कोटि कोटि प्रणाम सद्गुरु को…..🌹🙏🌹

Rajneesh Osho

अगर प्यास न हो तो धर्म की बात ही छोड़ दो

Osho anmol vichar In Hindi

Osho anmol vichar In Hindi

अगर प्यास न हो तो धर्म की बात ही छोड़ दो।
अभी धर्म का क्षण नहीं आया। अभी थोड़े और भटको।
अभी थोड़ा और दुख पाओ। अभी दुख को तुम्हें मांजने दो।
अभी दुख तुम्हें और निखारेगा।
अभी जल्दी मत करो।
अभी बाजार में ही रहो।
अभी मंदिर की तरफ पीठ रखो।
क्योंकि जब तक तुम ठीक से पीड़ा से न भर जाओ,
लाख बार मंदिर आओ,
आना न हो पाएगा।
हर बार खाली हाथ आओगे, खाली हाथ लौट जाओगे…

💘 पिव पिव लागी प्यास (दादू)💘

Rajneesh Osho

आशा रखोगे तो निराशा ही हाथ लगेगी

rajneesh osho ke anmol vachan

rajneesh osho ke anmol vachan

जीवन में न तो उदासी है और न निराशा है। उदासी और निराशा होगी–तुममें। जीवन तो बड़ा उत्फुल्ल है। जीवन तो बड़ा उत्सव से भरा है। जीवन जीवन तो सब जगह–नृत्यमय है; नाच रहा है। उदास…?

तुमने किसी वृक्ष को उदास देखा? और तुमने किसी पक्षी को निराश देखा? चांदत्तारों में तुमने उदासी देखी? और अगर कभी देखी भी हो, तो खयाल रखना: तुम अपनी ही उदासी को उनके ऊपर आरोपित करते हो।

अहंकार है कारण–उदासी और निराशा का।

निराशा का क्या अर्थ होता है? निराशा का अर्थ होता है: तुमने आशा बांधी होगी, वह टूट गई। अगर आशा न बांधते, तो निराशा न होती। निराशा आशा छी छाया है।

आदमी भर आया बांधता है; और तो कोई आशा बांधता ही नहीं। आदमी ही कल की सोचता है, परसों की सोचता है, भविष्य को सोचता है। सोचता है, आयोजन करता है बड़े कि कैसे विजय करूं, कैसे जीतूं?कैसे दुनिया की दिखा दूं कि मैं कुछ हूं? कैसे सिकंदर बन जाऊं? फिर नहीं होती जीत, तो निराशा हाथ आती है। सिकंदर भी निराश होकर मरता है; रोता हुआ मरता है।

जो भी आदमी आशा से जीएगा, वह निराश होगा। आशा का मतलब है: भविष्य में जीना; अहंकार की योजनाएं बनाना; और अहंकार को स्थापित करने के विचार करना। फिर वे विचार असफल होए। अहंकार जीत नहीं सकता। उसकी जीत संभव नहीं है। उसकी जीत ऐसे ही असंभव है, जैसे सागर की एक लहर सागर के खिलाफ जीतना चाहे। जीतेगी? सागर की लहर सागर का हिस्सा है।

मेरा एक हाथ मेरे खिलाफ जीतना चाहे, कैसे जीतेगा? वह तो बात ही पागलपन की है। मेरे हाथ मेरी ऊर्जा है। हम लहरें हैं–एक ही परमात्मा की। जीत और हार का कहां सवाल है? या तो परमात्मा जीतता है, या परमात्मा हारता है। हमारी तो न कोई जीत है, न कोई हार है। चूंकि हम जीत के लिए उत्सुक हैं, इसलिए हार निराश करती है।

भक्त का इतना ही अर्थ है; भक्त कहता है: तू चाहे-जीत; तू चाहे–हार;और तुझे जो मेरा उपयोग करना है–कर ले। हम तो उपकरण हैं। हम तो बांस की पोंगरी हैं, तुझे जो गीत गाना हो–गा ले। गीत हमारा नहीं है। हम तो खाली पोंगरी हैं। गाना हो, तो ले। न गाना हो–तो न गा। तेरी मर्जी। न गा, तो सब ठीक; गा–तो सब ठीक।

ऐसी दशा में निराशा कैसे बनेगी? भक्त निराश नहीं होता। निराश हो ही नहीं सकता। उसने निराशा का सार इंतजाम तोड़ दिया। आशा ही न रखी, तो निराशा कैसे होगी?

अब तुम कहते हो: मन उदास क्यों होता है? जीवन में उदासी क्यों है?उदासी का अर्थ ही यही होता है कि तुम जो करना चाहते हो, नहीं कर पाते। जगह-जगह पड़ गया हूं। और मैं पागल हुआ जा रहा हूं कि यह सब तो मैं इकट्ठे तो बन नहीं सकता! और इस सब ऊहापोह में मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि मैं क्या बनना चाहता हूं!

मनुष्य के जीवन की अधिकतम उदासी का कारण यही है कि तुम सहज नहीं जी रहे हो। तुम्हारा हृदय जहां स्वभावतः जाता है, वहां नहीं जा रहे हो। तुमसे कुछ इतर लक्ष्य बना लिए हैं।

🌼 कण थोड़े कांकर घने 🌼

Rajneesh osho

बातें व्यर्थ है अनुभव व्यर्थ नहीं है

osho quote in hindi

osho quote in hindi

आत्मा, परमात्मा, मोक्ष शब्द की उनके, विचार की भांति दो कौड़ी के हैं। अनुभव की भांति उनके अतिरिक्त और कोई जीवन नहीं। बुद्ध ने मोक्ष को व्यर्थ नहीं कहा है, मोक्ष की बातचीत को व्यर्थ कहा है। परमात्मा को व्यर्थ नहीं कहा है। लेकिन परमात्मा के संबंध में सिद्धांतों का जाल, शास्त्रो का जाल, उसको व्यर्थ कहा है।

ईश्वर की बहुत चर्चा करते – करते तुम्हें लगता है इश्वर को जान लिया। लेकिन ईश्वर के संबंध में जानना इश्वर को जानना नहीं है। तो बुद्ध कहतें हैं कि अगर जानना हीं हो तो परमात्मा के संबंध में मत सोचो, अपने संबध में सोचो। क्योंकि मूललत: तुम बदल जाओगे, तुम्हारी आंख बदल जाए, तुम्हारे देखने का ढंग बदले, तुम्हारे बंद झरोखे खुले, तुम्हारा अंतर्तम रोशन हो, तो तुम परमात्मा को जान लोगे। फिर बात थोड़े हीं करनी पड़ेगी।

ज्ञान मौन है, गहन चुप्पी है। कहना भी चाहोगे, जबान न हिलेगी। बोलना चाहोगे चुप्पी पकड़ लेगी। इतना बड़ा जाना है कि शब्दों में समाता नही। पहले शब्दो की बात बड़ी आसान थी। जाना हीं नहीं था कुछ, तो पता हीं नहीं था कि तुम क्या कह रहे हो। जब तुम ईश्वर शब्द का उपयोग करते हो तो तुम कितने महत्तम शब्द का उपयोग कर रहे हो, इसका कुछ पता न था। ईश्वर शब्द कोरा था, खाली था। अब अनुभव हुआ। महाकाश समा गया उस छोटे से शब्द में। अब उस छोटे से शब्द को मुह से निकलना झूठा करना है। अब कहना नही है। अब तुम्हारा पूरा जीवन कहेगा।

इसलिए बुद्ध ने कहा, बात मत करो। चर्चा की बात नही है। पीना पड़ेगा। जीना पड़ेगा। अनुभव करना होगा।

💘 एस धम्मो सनंतनो 💘

Rajneesh Osho

प्रेम का मार्ग मस्ती का मार्ग

osho quotes in hindi

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प्रेम का मार्ग मस्ती का मार्ग है।
होश का नहीं, बेहोशी का।

खुदी का नहीं, बेखुदी का।

ध्यान का नहीं, लवलीनता का।
जागरूकता का नहीं, तन्मयता का।

यद्यपि प्रेम की जो बेहोशी है
उसके अंतर्गृह में होश का दीया जलता है।

लेकिन उस होश के दीए के लिए
कोई आयोजन नहीं करना होता।

वह तो प्रेम का सहज प्रकाश है,
आयोजना नहीं।

यद्यपि प्रेम के मार्ग पर जो बेखुदी है,

उसमें खुदी तो नहीं होती,पर खुदा जरूर होता है।

छोटा मैं तो मर जाता है, विराट मैं पैदा होता है।
और जिसके जीवन में विराट मैं पैदा हो जाए,
वह छोटे को पकड़े क्यों?वह छुद्र का सहारा क्यों ले?

जो परमात्मा में डूबने का मजा ले ले,
वह अहंकार के तिनकों को पकड़े क्यों,
बचने की चेष्टा क्यों करे?
अहंकार बचने की चेष्टा का नाम है।
निर-अहंकार अपने को खो देने की कला है।

🌹ओशो संतो मगन भया मन मेरा🌹

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Rajneesh Osho


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